सोमवार, 7 अगस्त 2017

सावन पूर्णिमा 2017 एक दशक योग यात्रा संदेश : प्राण द्वारा तानिये तन , साधिये मन , पाइये अखंड आनन्द

आज सात अगस्त २०१७ है।
आज रक्षा  बंधन यानि सावन पूर्णिमा  है। वर्ष २००७ में आज यानि पूर्णिमा तिथि से ही मैंने योग के साथ अपने प्रयोग की शुरुआत की थी।
योग जो अब मेरे जीवन का अविभाज्य हिस्सा है।

 सावन शुक्ल द्वादशी से मुस्कान मेल सेवा बंद है। मोबाइल इस्तेमाल भी लगभग बंद है। स्मार्ट फोन का उपयोग पूर्णतः बंद है। 

मौन व्रत का समापन कल हो गया ।
मुस्कान मेल कब से पुनः शुरु करूंगा
खुद नहीं जानता
पर शुरु करूंगा अवश्य ये तय है।

दरअसल जीवन में कई घटनायें क्यों होती हैं हम नहीं जानते । 
बस ये घटित होती हैं। इनका परिणाम हमसे संबंधित सभी पक्षों को भुगतना पड़ता है। 

यह जीवन क्या है मस्ती है 
निर्झर ही इसका पानी है 
सुख दुख के दो राहों से बह रहा राह मनमानी है। 

पुरानी बचपन की पढ़ी कविता है। 

पर सुख दुख की अनुभूति समाप्त है अब। 
या तो असंग हो चुका हूं 
या 
निरमम हो चुका हूं 
जिसमें ना तो सुख की सिहरन है 
ना दुख की पीड़ा है

शेष है तो बस आनन्द 
जो हर अवस्था में तन और मन को बहाये लिये चला जा रहा है।

आनन्द की उपलब्धि सहज नहीं है।
तन को स्वस्थ रखने के लिये  मनपसंद भोजन
और
मन को प्रसन्न रखने के लिये अपने पास उपलब्ध क्षण में मनोनुकूल काम हो
तो आनन्द ही आनन्द ।

पर समस्या मन को लेकर होती है।
मन जो समझ गये उनके लिये समस्या नहीं है।
क्योंकि मनोनुकूल मिलना तभी होता है
जो भी मिला पल में
वही मन को भा जाये।

चेतना को इस धरातल पर लाना ही योग है। 

दस वर्षों की योगयात्रा ने ये तो दिया है मुझे
कि
आज
तन को समझ सकूं
मन को समझ सकूं
और
तन मन को साथ लेकर आनन्द को हर पल प्राप्त रह सकूं।

दो हजार सात  में मई जून में एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल से साल भर के लिये व्रत और त्यौहारों पर कार्यक्रम बनाने का प्रस्ताव मिला था । 

 व्रत की सत्यता समझने के लिये आज ही की तिथि से अगस्त महीने में व्रत की शुरुआत हुई थी। यदि ठीक से याद करूं तो अंग्रेजी कैलेंडर से तारीख थी २८ अगस्त प्रायः क्योंकि कैलेंडर में इसी तिथि को रक्षा बंधन दिखाया जा रहा है। 

यदि अपने संकल्प को याद करूं तो पूर्णिमा तिथि और  अगस्त महीना याद है। जब व्रत और योग दोनों को एक संकल्प के तहत साधने के लिये मैं चला था।

जो परिणाम  दैनिक योगयात्रा और दो या तीन पूर्णिमा को व्रत रख कर प्राप्त हुए थे यानि लगभग तीन महीनों तक नियमित रोज योग अभ्यास के बाद उस अनुभव के आधार पर धारावाहिक कार्यक्रम के अनेक एपिसोड बने और प्रसारित हुए ।

मेरी योग यात्रा जो शुरु हुई  ठीक दस वर्ष पहले  
वह  
आज तक चल रही है।

आनन्द चाहिये
तन का
मन का
तो
तन को तानिये
मन को साधिये 
प्राणों के योग द्वारा 

बिना प्राणों को जाने 
प्राणों के आवागमन के साथ
तन का रमण किये
मन को नहीं जाना जा सकता
और
ना ही तन की सीमाओं का अतिक्रमण किया जा सकता ।

योग का संकल्प लीजिये 
व्रत कीजिये 
हम आपके साथ हैं। 

आइये हम मिल कर चलें 
आनन्द लें जीवन का 
इस पल का 
अगले पल का 
पल पल का 

इति आनन्द गाथा 
शुभम



रविवार, 30 जुलाई 2017

गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती ( 30-07-17 रविवार ) सावन शुक्ल सप्तमी से सावन पूर्णिमा तक एक सप्ताह का खंड मौनव्रत

आज से मौन व्रत।

एक सप्ताह के लिये। पूर्णिमा को मौन तोड़ने की इच्छा। हालांकि यह खंड मौन अवस्था है। 

खंड मौन क्या

इस एक सप्ताह में दो दिवस ऐसे जिसमें आजीविका के लिये
रोटी के लिये सीमित अवधि के लिये मौन तोड़ना अनिवार्य। सो इन दो दिवस मौन टूटेगा।
पर केवल रोटी अर्जन के लिए। अन्य कार्यों के लिये वाक संयम।

रविवार सावन शुक्ल सप्तमी यानि आज तीस अप्रैल 2017 को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। 

पिछले वर्ष इस तिथि को दो आयोजनों में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला था।
प्रातःकाल मेट्रो से नौएडा, वहां से श्री रामवीर सिंह जी और श्री पाराशर जी के साथ ग्राम कलूपुरा पोस्ट झाझर उत्तर प्रदेश में आयोजित तुलसी जयंती और सोरों जी सूकर क्षेत्र गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्मस्थल माने जाने वाले तीर्थों में से एक में गोस्वामी जी का सुमिरन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

पर
इस वर्ष आज अपने आवास पर हूँ।

दरअसल सावनशुक्ल प्रतिपदा यानि 24 जुलाई 2017 को अचानक मोबाइल प्रयोग कुछ दिनों के लिये छोड़ने का योग बना और आज से मौन व्रत की इच्छा हुई दो दिन पूर्व।
सो संकल्प हुआ और मौन व्रत जारी।
यह
सौभाग्य नहीं तो और क्या
कि 
अपने प्रयोग पर टिक सकूं इसके लिये अनुकूल परिस्थितियां हैं।

जीवनसंगिनी मेरी सनक की शिकार
आत्मज पुत्र सहयोगी
मित्र झेलने को विवश
और
अन्य परिजन पुरजनों के पास
मुझे रोकने का कोई विकल्प नहीं।
।।

जीवन संगिनी हंसती हैं।
कहती हैं 
चलो कोई बात नहीं, 
तुम मेरे साथ हो
ये कम है क्या
तुम चुप हो
चुप सही
कोई ना कोई रास्ता 
मैं निकाल लूंगी 
तुम्हारी उपयोगिता का 
तुम्हारे साथ का।
और 
तुम हो 
मेरे साथ
मेरे पास
तो और क्या चाहिये
काफी है साथ
।।
आत्मज पुत्र ने पूछा था बहुत पहले
जब आयु थी कम
और गिनता था अपनी अंगुलियों पर 
प्राण नियमन के लिये 
मेरे प्रयोगों का साक्षी बन 
हर आती जाती सांस पर 
अंतस्थ वायु 
संपीड़ित हो
बाहर
निकलती अनायास
बन डकार
कहता था 
बोलो सॉरी
जितनी डकार की ध्वनि 
उतनी बार 
सॉरी  
उस आयु में निश्चल देख देर तक
मुझे
जब धयान हुआ  भंग
पूछा था
पुत्र ने 
तो तुम हिमालय चले जाओगे 

???

दिया था जवाब मैंने
मुस्कुरा कर
पता नहीं
अभी तो नहीं
।।

इस बार जब हुआ मौन 
तो अपने स्कूल के औजारों में से 
ढूंढ कर लाया
आधुनिक स्लेट
ह्वाइट बोर्ड मार्कर
और बोला
ठीक है
तुम मत बोलो
पर 
लिख कर तो मेरे सवालों का जवाब दे लेना।
।।
जब तप के लिये
संयम के लिये
हो विकल्प
निज
आवास में
तो हिमालय जाना जरूरी क्या
।।

एक सप्ताह का मौन 
क्या दे जायेगा
कुछ दिनों का 
मोबाइल फोन विहीन जीवन
क्या गुल खिलायेगा

क्यों सोचूं
इस पल 
क्षणजीवी हूंँ
आनन्द लेता हूंँ
हर पल का
।।

मुस्कान मेल बन्द है।
सोमवार विगत 24 जुलाई रिकार्डिंग के बाद से
आज  सातवां दिवस है।
विगत अंक में 
विद्या अविद्या के नाम न्यौछावर हुई थी मुस्कान
विद्या क्या 
अविद्या पर 
दर्ज हुई थी अपनी बयान
और
उसके बाद मौन।
।।
लंबा विराम
।।

मुस्कान मेल फिर शुरु होगा
हूं जानता
कब
नहीं पता।।


पर होगा अवश्य
यह ज्ञात है।

।।

मौन को भी देख लूं
वाक को भी साध कर देखूं
इच्छा बस इतनी सी

।।

जन्म यह एक
सत्य
अगला 
पिछला 
कौन जाने
।।
इस एक जन्म में
कर लूं इच्छा
पूरी।

।।

दशक पूर्व
संभवतः इसी मास में या अगले माह पूर्णिमा तिथि से 
शुरु हुई थी वर्तमान यात्रा
जो बन चुकी 
जीवन संकल्प
।। ।।
अब तो
हर पल है
गान
।।
नर्तन
।।
सांसों का 
प्राण का प्रयोग प्राण के साथ
पुलक उठे अंग अंग
सिहर उठे गात
मुस्कुरा उठे मन
।।
मुस्कान ऐसी 
जो जाये ना
उमंग ऐसी 
जो थिरकाये तन बदन 
उमगाये मन
बन बसंती पवन
।।
तो फिर प्रयोग
मौन का।
।।
मौन से मौन
जब मिले
तो मुखर हो जाये 
जीवन
।।

है ये रहस्य खुला
दशक पूर्व
आरंभिक ओम्कार प्रयोग के साथ
।।
एक ओम्कार सत् नाम
ओम्कार जप
ओम्कार नाद 
करता तन को तरंगित 
मन को प्रशान्त
।।

सीमित अवधि में होती
हर इच्छा पूरी
ओम्कार जप का प्रभाव
।।
पर खतरा यह
कि
प्रशान्त मन में हिल्लोल हो जाता समाप्त
इच्छायें उठनी हो जाती बंद
।।

इसीलिये  ओम्कार जप
नहीं करने का
प्रायः विधान
।।

ओम्कार के प्रभाव को खंडित करने के लिये अन्य पूरक मंत्र का योग
अथवा उद्देश्य अनुकूल
लक्ष्य हेतु
ओम्कार तीर पर
मंत्र
देव हों सवार

।।
सत्य
एक बिन्दु 
।।

इस बिन्दु को ढूंढता
प्रयोगकर्ता।।
अपने प्रयोग से बिन्दु का
जितना अंश 
प्रत्यक्ष पाता
सत्य
बस इतना सा।

।।
सत्य को प्राप्त कर सकूं
यही तो लक्ष्य
मौन का प्रयोग भी
इसी दिशा में
वाक संयम
का हेतु
भी
यही
।।
सो बढ़ चल मन
तरंगित हो तन
ऊर्जस्वित चेतन
।।
ओम्


सोमवार, 27 मार्च 2017

चैत्र सोमवती अमावस्या वर्ष २०१७ का ऐलान, रामनवमी पांच अप्रैल से मुस्कान मेल सेवा पुनः शुरु

आज २७ मार्च सोमवार, चैत्र माह की सोमवती अमावस्या है। वर्ष २०१७ है । संवत और तिथियों का ध्यान मैं रखता नहीं। तिथियों को लेकर पंचांग नियंताओं के बीच इतना विवाद है कि किस तिथि  को बिल्कुल ठीक ठीक क्या होना है इसे लेकर मठाधीश लठम लट्ठ करते रहते हैं। और अपनी दिलचस्पी लट्ठ में अब रही नहीं।
ऐसे में मुस्कान मेल का स्थगन हमने लट्ठ की वजह से नहीं किया था । ये तो स्वांतःसुखाय हुआ था। बेशक कारण हमने तात्कालिक परिस्थितियों जीवन के कृष्ण पक्ष को दिया ।

पर क्या वाकई

जब मुस्कान सच्ची वाली मिल जाये एक बार तो फिर ये जाती है क्या 
परिस्थितियां अनुकूल हों या प्रतिकूल 
खिलती नहीं रहती है अपने आप हर पल

ऐसे में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का प्रश्न  उठना चाहिये था क्या
मुस्कान को लेकर कोई संशय  रहे 
तो 
फिर यह मुस्कान  
सच्ची वाली है क्या 

मुस्कान मेल स्थगन की सूचना देते हुए
हमने कहा था
कि
जीवन के कृष्ण पक्ष में मुस्कान मेल अल्पकालिक विराम ले रहा है ।

यहां ये सवाल प्रासंगिक बनता है कि क्या जीवन का कृष्ण पक्ष समाप्त हो गया

नितांत वैयक्तिक सवाल है अपने आप से।

जब कभी आप इसे पढ़ें
और
आप की मानसिकता भी
जीवन के कृष्णपक्ष जैसी हो तो अपने आप से सवाल पूछ सकते हैं।

यहां इस कालम में मैं यानि मनोज पाठक बिना किसी राग द्वेष हानि लाभ यश अपयश की चिन्ता किये बिना अपनी अंतरात्मा और विवेक को साक्षी रख कर सत्यनिष्ठा के साथ अपने अनुभव और तथ्य रखता हूँ। इनका उद्देश्य रहता है समान परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति को इन अनुभवों का लाभ हो। 

लाभ नहीं हो तो नुकसान किसी हालत में भी किसी को नहीं हो।

जो इन अनुभवों को सत्य मानकर
स्वयं आगे बढ़े
प्रयोग करे
उसे पूर्ण लाभ हो
और
उसका विश्वास
उस एक मालिक पर दृढ़ हो
जो हम सबका नियंता है।

अखिल ब्रह्मांड का नियंता।।



कौन है अखिल ब्रहांड का नियंता
कौन जाने
जितना हमने जाना, समझा अपने पंच इन्द्रियों के माध्यम से
और पांच इंद्रियों से परे
समझने के लिए जो हो सकता है
उसे
एक ही पाया है।


ऐसे में
मेरे अपने वैयक्तिक जीवन का कृष्णपक्ष और शुक्ल पक्ष क्या मायने रखता है


दरअसल काल का पहिया किस गति से कब स्वयं के चक्र को चलायेगा यह हम कहां समझ पाते हैं।

विगत कुछ समय से काल का ये पहिया आड़ा तिरछा, उल्टा सीधा धीमी तेज कुछ इस गति से चलायमान है कि इसकी रफ्तार समझ पाना कठिन साबित हो गया।

ये काल का पहिया कभी थमता तो है नहीं
ऐसे में इसकी गति और इसकी चाल दोनों को समझना दुरूह

इसका मतलब ये नहीं कि मुस्कान खो गयी है।

मुस्कान है तो खिली हुई 
हर पल मुस्कुराती  
वही शिशु वाली मुस्कान

कभी खिलखिलाती
इतराती,बलखाती  कभी
इठलाती सी मुस्कान

लेकिन
इस खिली मुस्कान को
अलग अलग अंदाज में समेट कर फैलाना अलग अलग लोगों , समूहों के साथ बांटना
एक ही अवधि में कठिन हो गया


समय के वही चौबीस घंटे
सबके पास
इस चौबीस घंटे में जितना निवेश समाज के नाम किया जा सकता है
वह हमने किया


विलासिता को सीमित करना, आवश्यकता की पूर्ति करना 
और 
अनिवार्य का पालन हर हाल में करना

मुस्कान सतत खिलाये रखने का सरल सा सूत्र है।

हमने इस सूत्र को समझा है। 

इसी सूत्र में आपको बांधा है।

इसीलिये कह रहा हूं
आपसे
सिर्फ आपसे
कि
मुस्कान मेल
जो 23 फरवरी से स्थगित है 

वही मुस्कान मेल 
राम नवमी यानि ५ अप्रैल २०१७ से फिर शुरु करने की इच्छा है।

देखिये वर्ष दो हजार सोलह में जानकी नवमी यानि पंद्रह अप्रैल से मुस्कान मेल की  यात्रा शुरु हुई है।
बीच बीच में स्थगित हुई अब फिर रामनवमी से शुरु होगी।

दरअसल नौ फरवरी दो हजार सत्रह से १३ अप्रैल १७ के बीच अयोध्या से रामेश्वरम के बीच मौजूद रामजी के वनगमन से संबंधित तीर्थों के बारे में एक जनजागरुकता अभियान शुरु हुआ। श्री राम सांस्कृतिक शोध संस्थान न्यास के तत्वावधान में यह यात्रा आयोजित हुई। मैं इन तीर्थों को एक सूत्र में पिरोने वाले डॉ रामअवतार शर्मा को विगत एक डेढ़ दशक से जानता हूं। पिछले चालीस वर्षों से वे लगातार इन तीर्थों को एक सूत्र में पिरोने के लिए संकल्पित हैं। 

रामजी हुए या नहीं हम अंतहीन बहस कर सकते हैं पर वाल्मीकि हमारे इतिहास पुरुष हैं इससे इन्कार नहीं कर सकते। कालिदास और तुलसी दास हमारे इतिहास पुरुष हैं इससे मना नहीं कर सकते ।

यदि वाल्मीकि, कालिदास और तुलसीदास जिन स्थलों को रामजी के तीर्थ मानते हैं उन्हें यदि हम अपना तीर्थ नहीं स्वीकार करें तो अपने अस्तित्व के प्रति संदेह करना होगा। 

रामजी की यात्रा नदियों और सरोवरों के  पावन जल में स्नान करते हुए आगे बढ़ी इनके जल को पेयजल के रूप में इस्तेमाल करते हुए हुई।
यदि इक्कीसवीं सदी में हमारी गंगा मैली और यमुना जहरीली हो गयी है तो इसका पाप धोने के लिए हमें ही आगे आना होगा।

मुस्कान मेल ने
अपने इसी दायित्व बोध के अंतर्गत
जब काल का पहिया अनियंत्रित गति और दुरुह चाल का पाया तो खुद को विराम देना उचित समझा।

मुस्कान मेल जिस मंच पर शुरु हुआ उस मंच पर धर्म और धार्मिक गतिविधियों के प्रति अपने दर्शन हैं, अनुशासन हैं उस अनुशासन का सम्मान करते हुए 

जब जीवन के कृष्ण पक्ष में काल की वक्र गति और अनियंत्रित चाबुक का प्रहार हुआ तो 
मुस्कान को राम के नाम समर्पित कर दिया।

राम और मुस्कान एकरूप हो गये। रामजी की वन संबंधी गाथा और लीलाभूमि के साथ मुस्कान मेल संदेश का एकीकरण कर दैनिक प्रातः समाज सेवा चलती रही।

अब रामजी की लीला कहिये
उनकी कृपा कहिये
हम अपनी सांस को तो छोड़ दे सकते हैं
पर 
रामजी को नहीं छोड़ सकते। 

रामजी की कृपा से श्री राम नवमी पांच अप्रैल २०१७ से मुस्कान मेल अपनी प्रातःसेवा सभी मंचों पर शुरु करे ऐसी कामना है।

आज सोमवती अमावस्या है। कल या परसों से अपने गोत्र, कुल और वंश परंपरा के अनुसार लोग चैत्र नवरात्रि पर्व मनायेंगे।

हम भी अपनी इच्छानुसार अपने परंपरानुसार व्रत करते हैं। पूजन भी करते हैं। और संकल्प भी लेते हैं।

मुस्कान मेल की दैनिक धारा फिर प्रवाहित होगी।

पांच अप्रैल
मुस्कुरायें हम 
बार बार
साथ साथ
मुस्कान मेल की यात्रा फिर शुरु 
बहुत जल्द
रामनवमी दो हजार सत्रह
मुस्कुराइये ना
 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

जीवन के कृष्ण पक्ष में मुस्कान मेल स्थगन , ड्रीम द्वारका परियोजना जारी

ड्रीम द्वारका के पोस्ट सुदीर्घ अवधि से लंबित हैं। 26 दिसंबर के बाद कोई प्रगति रिपोर्ट नहीं है। 

दरअसल काल का पहिया किस गति से कब स्वयं के चक्र को चलायेगा यह हम कहां समझ पाते हैं।

मुस्कान मेल 23 फरवरी से स्थगित है। स्थगन की सूचना देते हुए हमने कहा था कि जीवन के कृष्ण पक्ष में मुस्कान मेल अल्पकालिक विराम ले रहा है ।  श्रोता समाज को यह जानकारी नियमित मेल के साथ आडियो कैप्सूल के बिना दी गयी । यह भी कहा गया कि  पुनः शुरुआत करने से दो दिन पूर्व सूचना दी जायेगी।

मुस्कान मेल पर अपनी प्रतिक्रिया देने वालों में से अधिकांश इसका संज्ञान लेने में चूके परंतु आदरणीय शशिपाल शर्मा शास्त्री जी ने ना केवल प्रतिक्रिया दी अपितु कृष्णपक्ष से उबरने के लिये आशीर्वचन भी दिये, शुभास्ते पंथ ......

आभार

मुस्कान मेल समसामयिक विषयों पर टिप्पणी और सहज होकर जीवन आनन्द लेने की सलाह है। हम कुछ पल शिशु वाली मुस्कान  लायें, सहज हास्य बोध तन मन में पनपने दें यह प्रयास है।

लेकिन संप्रति दो जिम्मेदारियां एक साथ हों , दोनों की प्रकृति एक दूसरे से अलग हो और एक संकल्प अनिवार्य हो जिसे छोड़ना अपनी चेतना के स्तर पर कठिन हो और दूसरा अनिवार्यता नही आवश्यकता और विलासिता के बीच की स्थिति हो तो आवश्यकता को कम किया जा सकता है और विलासिता से मुक्त हुआ जा सकता है। 
मुस्कान मेल के साथ यही स्थिति है। 

मुस्कान मेल एक कार्यक्रम भर है। जिसे गंभीरता से कम लोग लेते हैं। हां मुस्कान के लिये सुनते अनेक लोग हैं। यह भी कम नहीं है। 

लोग सुनते हैं तो अपना उद्देश्य पूरा हो रहा है। 

पर जो समय का दबाव है उसमें दो परस्पर अलग रूचि को एक साथ ले चल पाना कठिन हो गया है। 
ऐसे में मुस्कान मेल का स्थगन लंबा चल सकता है। 
कामना करें कि यह स्थगन शीघ्र समाप्त हो।




सोमवार, 26 दिसंबर 2016

पिघले पाषाण रूपी जल का संदेश समाज के नाम

पाषाण जब पिघलता है
पानी बन निकलता है
फिर कहां होश
भागे मदहोश

पर्वत
पहाड़
घाटी

अल्हड़
इठलाती
बलखाती
मुस्काती

भागती चली धार
गगन को घूरती
पवन को चूमती
वसुंधरा को बेधती
मैदानों के पार 
सागर को ढूंढती
भागे चले  धार

ठहर जरा
ये नदी है या नार
जल है जलधार

लिंग है क्या
किसको है होश 
भागे मदहोश
पर्वत पहा़ड़ घाटी 
मैदानों के पार 
भागे जलधार 

ये मुस्कान मेल की गाथा है जो सतह के ऊपर भागने के साथ कुछ पल ठहर अब अंतःसलिला होकर अपनी तैयारी में संलग्न है।

क्षिति जल पावक गगन समीरा
का सूत्र
कुछ इस तरह तन मन पर खुला है कि इसे सुलझाने में आगे बढ़ाने में यह एक जीवन तो कम है।

पर

जितनी सांसें हैं अपने पास 
उससे अधिक उम्मीदें हैं अपने पास 

और
क्यों ना 

संभावनाओं के साथ हर पल  
खुल कर जिया जाये
लक्ष्य के लिये जी भर लगा जाये 

इसी लिए मुस्कान मेल ने एक सप्ताह के विराम के बाद,  एक अनिश्चितकालीन विराम लिया है। 

यह विराम आराम के लिए नहीं है।

आगामी वसंत पंचमी से पहले अपनी तैयारियां पूरी हो जायें और हम ठोस कलेवर में पुस्तकाकार अपनी बात समाज के समक्ष रख सकें इसके लिए विराम है। इस अवधि में मुस्कान मेल की बातों को संयोजित कर ठोस तथ्यों के साथ सबके सामने उपस्थित करने की योजना है।

मुस्कान मेल की अब तक की उपलब्धि संतोषजनक है। 
ड्रीम द्वारका की प्रगति धीमी पर सघन है।
संतोषजनक 
सुखद

यही तो लक्ष्य है जीवन का।

हर किसी का तन स्वस्थ हो
मन प्रसन्न हो
जीवन आनन्दमय हो।

आप हर पल ऊर्जस्वित रहें
यह कामना है

शुभ विदा वर्ष 2016.   

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

बहुत चले, थोड़ा रुके, मुस्कुराए संसार ड्रीम द्वारका परियोजना की पहली वर्षगांठ कार्तिक शुक्ल नवमी 09-11-2016

बहुत चले, थोड़ा रुके , मुस्कुराए संसार
An Initiative परिवार संग इठलाए घर बार
http://www.facenfacts.com स्नेह  पाएं बार बार
http://www.jantajanardan.com संग खिलखिलाएं हर बार 

संक्षेप में यही है ड्रीम द्वारका के एक वर्ष लगातार चलते रहने का लेखाजोखा ।

आज फिर कार्तिक शुक्ल नवमी है । आज ही की तिथि को ठीक एक साल पहले इस ब्लाग की विधिवत शुरुआत 20 November 2015  को हुई थी ।

कार्तिक शु्क्ल नवमी यानि भारतीय संस्कृति के लिए प्रत्येक वर्ष अक्षय नवमी या आंवला नवमी के रूप में किसी नए कार्य की शुरुआत के लिए एक महत्वपूर्ण तिथि ।

आज वर्ष दो हजार सोलह में भी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ पर हम खड़े हैं।

ड्रीम द्वारका परियोजना, भारत वर्ष, अमरीका और पूरी दुनिया के लिए यह तिथि बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। 

ड्रीम द्वारका परियोजना ने अपने घोषणा पत्र में जिन लक्ष्यों को तय किया, उस पर धीमी गति से , सधी चाल से चल रहा है। समय अपनी गति से चलेगा । जिस अनुरूप लक्ष्यों पर समय निवेश किया गया उस अनुपात में परिणाम बहुत अच्छे निकले हैं। एक बीज रूप से पौधा रूप में हम स्थिर रूप में खड़े होने में सफल हुए हैं।

ड्रीम द्वारका परियोजना के अंतर्गत तन  को स्वस्थ मन को प्रसन्न बनाने का अभियान मुस्कान मेल अपने आपको सफलता पूर्वक स्थापित कर चुका है।

पौधा रोपण के स्तर पर अपने गमले में उगाए दो आंवला वृक्ष देव एक मंदिर और एक विद्यालय में मुस्कुरा रहे हैं । दोनों द्वारका उपनगरी में विराजमान हैं। उपलब्ध समय और परिस्थितियों में  वृक्ष देवों के अन्य स्वरूप पर कार्य नहीं किया गया। 

हमें विगत नवरात्रि पर अक्टूबर महीने में तन के रूप में दो समाचार वेबसाइट फेसएनफैक्ट्स और जनता जनार्दन डाटकाम अंग्रेजी और हिन्दी में मिले हैं। इनके साथ आने वाले दिनों में हम आगे बढ़ेंगे और मुस्कुराएंगे ।

पर इससे पहले मानव मूर्तियों को प्राणवंत बना, मुस्कुराने का अभियान 
जानकी जयंती पंद्रह अप्रैल से इस वर्ष एआइजी वाट्सएप परिवार में मुस्कान मेल के रूप में शुरु हुआ

आज यह दुनिया के अनेक देशों , भारत के अनेक नगरों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में अनेक घरों में ध्वनि संदेश के रूप में सुना जा रहा है।

तन को स्वस्थ रखने मन को प्रसन्न बनाने के लिए प्रति दिन प्रातःकाल आडियो संदेश के रूप में दस से बीस मिनट तक का ध्वनि संदेश रिकार्ड किया जाता है और मुस्कान मेल, एआइजी वाट्सएप समूह सहित लगभग आधा दर्जन समूहों को फारवर्ड किया जाता है। 

मुस्कान मेल की लोकप्रियता तेज गति से बढ़ रही है । लोग इसे सुनना पसंद करते हैं । इसका अगला चरण लोगों के तन मन की प्रसन्नता के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण शिविर के रूप में विकसित किया जायेगा।

ड्रीम द्वारका लोक कल्याण के लिए आरंभ हुआ है । लोक का अर्थ केवल मानव नहीं अपितु इस धरती के सभी जीव अजीव दृश्यमान अदृश्य सभी पक्ष का कल्याण हो और परस्पर सहयोग से हम सभी एक दूसरे का कल्याण करें।

द्वारका नगरी में भंवरों का आगमन हो गया है । सितंबर महीने में हमारे अपने आवास में भंवरा देव जी ने गुनगुनाते हुए आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। अविन पाठक ने अपने कमरे में उनकी उपस्थिति से परिचित कराया। बाद में ये भंवरा महोदय हमारे आवास के सामने के मैदान में पेट्रोल पंप के पीछे पेड़ों के झुरमुटों के ऊपर पीपल और  कीकर के फूलों पर देर तक मंडराते रहे ।

भंवरों के द्वारका में आगमन के लिए हमने इस साल जानकी जयंती से पहले होली के आसपास से प्रार्थना शुरु की थी । यह प्रार्थना नवरात्रि में स्वीकार कर ली गयी । भंवरे अब द्वारका के पर्यावरण का हिस्सा बन गए हैं।

  चीलें दो हजार नौ में पहली बार दिखी थीं। 2011  में अक्टूबर महीने में लगभग पांच सौ से हजार चीलों की सभा हमारे सामने वाले मैदान में हुई थी और इस वर्ष 2016 , मार्च से जून के बीच हमने चील दंपत्तियों को अपने दो बच्चों की परिवरिश करते देखा है। 

  चील के दोनों बच्चे अब बड़े हो गए हैं। पर जब ये छोटे थे तो 2016, अगस्त महीने में कबूतरों के झुंड. दो चार कौओं और दो टिटहिरी ने इन दोनों बच्चों को माता पिता की अनुपस्थिति में किस तरह दूर आसमान में भगाया था हम उसके साक्षी हुए थे। लेकिन यह चील परिवार हमारे पड़ोस में रहता है। बच्चे अब नवंबर तक वयस्क हो गए हैं और कोई अन्य चिड़ियाँ इनके साथ हिमाकत नहीं कर सकती।

रंग बिरंगी तितलियां  द्वारका के आसमान में खूब दिखती हैं। अनेकों तरह की चिड़ियां हैं। 
यानि पेड़ जिस अनुरूप द्वारका में लगे हैं उस अनुरूप पक्षी जगत और कीट जगत का संतुलित विकास हो रहा है । 
यह ड्रीम द्वारका के लिए संतोष की बात है।

एआइजी के साथ मिल कर हमने प्रदूषण के विरुद्ध विजया दशमी पर रावण पुतला दहन बंद करने  और दीवाली पर आतिशबाजी पूरी तरह बंद करने और दीप जलाने का अभियान शुरु किया।

इस अभियान को बीज रूप में व्यापक सफलता मिली ।

डॉ ज्ञान सिंह गौडपाल के नेतृत्व में अनेक लोगों ने इसे अपना समर्थन दिया। 

दिल्ली प्रदेश माहेश्वरी समाज की अगुआ किरण लाढा , एआइजी परिवार की आदरणीया मनोरमा दीदी जी , सुनीता अहलुवालिया, श्रुति शर्मा, सुमेधा रानी, रत्ना माहेश्वरी, हरजीत कौर, सतविंदर कौर, जैसी अनेक मातृशक्तियों ने आतिशबाजी के विरुद्ध अभियान चलाया ।

यह अभियान द्वारका में सीमित रूप से और  पश्चिमी दिल्ली के अनेक इलाकों रजौरी गार्डन, टैगोर गार्डन, मानसरोवर गार्डन, रमेश नगर, सुभाष नगर, तिलक नगर जैसे क्षेत्रों में सघन रूप से लगातार अनेक दिनों तक चला।

एआइजी परिवार के वरिष्ठ कनिष्ठ सदस्यों ने इसमें बढ़चढ कर योगदान दिया।

सरदार सतनाम सिंहजी ने अभियान मार्च के लिए निःशुल्क प्रतिदिन अपने वाहन उपलब्ध कराये। 

सजगता अभियान रैली मार्च में युवा सुमीत के अलावा बुजुर्ग बलबीर शर्मा, मोहन अग्रवाल, प्रवीण कुमार सूद, योगाचार्य कौशल जी जैसे मनीषियों , विद्वानों ने हिस्सा लिया।

दीपावली पर दीपक जलाओ अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि समाज के हर वर्ग के लोगों ने इस भावना का स्वागत किया। देश के अनेक हिस्सों से धन त्रयोदशी से लेकर दीपावली तक  अपने घर प्रांगण में  दीपक जलाने के संदेश मिले।
सबसे उल्लेखनीय संदेश राजकोट जगन्नाथ मंदिर से मिला। आदरणीया साध्वी अरुंधती दीदी जी के नेतृत्व में राजकोट मंदिर में दीपावली पर भव्य दीपकों से मंदिर प्रांगण सुसज्जित हुआ। राजकोट  जगन्नाथ मंदिर के चित्र साथ संलग्न हैं।

 मंदिरों  में जब इस तरह दीप जगमगाते हैं तो यहाँ पूजन के लिए आने वाले भक्त भी प्रेरित होते हैं। यहाँ से वापस लौटते समय अपने घरों में दीपक जलाने का संकल्प लेकर जाते हैं । 

राजकोट जगन्नाथ मंदिर का यह संदेश दूर तक पहुंचेगा। देर तक लोगों के तन मन को आलोकित करेगा।

दिल्ली के कुछ मंदिरों में भी दीपदान हुआ।

पर आतिशबाजी नहीं चलाने का लक्ष्य आटे में नमक के बराबर भी प्राप्त नहीं हुआ।

परिणाम स्वरूप दिल्ली के ज्ञात इतिहास में पहली बार  दीपावली के अगले दिन से नाक पर पट्टी लगाने की नौबत आ गयी जो आज 09 नवंबर तक जारी है।

सुश्रुत संहिता में ऋतुचर्या अध्याय में जनपद ध्वंस होने के जिन कारणों का उल्लेख किया गया है वह केवल दिल्ली में ही नहीं अपितु देश के अधिकांश स्थानों पर घटित हुए । परिणाम स्वरूप पूरे देश में दीपावली के अगले दिन से जहरीले वायु प्रदूषण की अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हुई। 

बड़ी संख्या में लोग, आंखों में जलन, उल्टी,  श्वांस रोग, शिरो वेदना रोग सहित अनेक बीमारियों के शिकार हुए।लेकिन देश की राजधानी खबरिया चैनलों की भी राजधानी है। 

देश में अन्य स्थानों की वेदना की सूचना तो कम मिली पर दिल्ली में भयंकर प्रदूषण की खबर छाती पीट पीट कर दहाड़ें मार मार कर गायी और सुनायी गयी।


हाहाकार मच गया । आनन फानन में देश की राजधानी दिल्ली में स्कूल बंद कर दिए गए।

अमला चाकर नौकर मालिक , समाधान किसी के पास नहीं है क्योंकि अपने अतीत से सबक लेने की फुर्सत किसी को नहीं है। जिस पल नवरात्रि के दिनों में आतिशबाजी से दूर रहने के लिए सजग किया जा रहा था अधिकांश लोग सुनने को नहीं तैयार हुए। जिन्होंने सुना उन्हें दीपक पर स्थिर रहते हुए भी आतिशबाजी से दूर रहने की संकल्प शक्ति जागृत नहीं हुई।
परिणाम अब सब भुगत रहे हैं।

क्या वाकई समाधान किसी के पास नहीं है ?

नहीं ऐसा नहीं है । समाधान है। ड्रीम द्वारका के पास समाधान है। स्थायी समाधान है। 
पर इस समाधान पर चलेगा कौन ?
 विश्वास कौन करेगा ?

लोग विश्वास कर सकें 
इसलिए एक छोटा सा वैदिक समाधान यंत्र विडियो संदेश के रूप में यू ट्यूब पर अपलोड किया गया है। 

उदाहरण के रूप में यहां साथ संलग्न किया गया है।  
इसे सुनें
देखें।
अपने घरों में आजमा कर देखें। 

घर के अंदर का 
प्रदूषण 
हर हाल में दूर होगा 
सौ प्रतिशत 
हजार प्रतिशत 
अनंत प्रतिशत दूर हो जायेगा 
यह  विश्वास हमें है।

सत्य को गवाही की जरूरत नहीं होती फिर भी आप अपनी आंखों से विडियो देखें, आज़माएं।

अपने घर के अंदर का प्रदूषण दूर होकर सुरभित वातावरण होने का  जिस पल भरोसा हो जाए उस पल बाहर के प्रदूषण के समाधान के लिए साथ मिल कर हम चलें यह आह्वान है।

  दिल्ली के वातावरण में  कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि से स्वतः स्थिति संभलनी शुरु हुई। सप्तमी और अष्टमी को स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है पर यह क्रम बना रहेगा इसकी उम्मीद नहीं रखें । हम अपने कर्मों का फल प्राप्त करेंगे। 

आज कार्तिक शुक्ल नवमी है। मौसम फिर से करवटें बदल सकता है। हम सामूहिक प्रयासों से अपने पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं। ये प्रयास सत्य पर आधारित हों , ज्ञान पर आधारित हों कर्म निष्ठा पर आधारित हों तो सफलता निश्चित मिलेगी।

एक ओर अमरीका में अप्रत्याशित चुनाव परिणाम अधिकांश के लिए आए हैं। पर मुस्कान मेल ने जब डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी उम्मीदवारी की अधिकृत घोषणा भी नहीं की थी, लगभग डेढ़ वर्ष पहले उसी समय भविष्यवाणी की थी कि वे विजयी हो सकते हैं।

लोकतांत्रिक चुनाव जब कभी होते हैं 
जहां कहीं होते हैं 
तो 
वोट डालते समय 
एक ही कारक 
मतदाता के लिए मुख्य होता है 
हमारे हितों की रक्षा सबसे बेहतर कौन कर सकता है। 

भारत में विगत 2014  संसदीय चुनाव में  वर्तमान प्रधानमंत्री ने यही विश्वास मतदाताओं को दिया था। दिल्ली विधानसभा के विगत 2015 चुनाव के दौरान यही विश्वास वर्तमान मुख्यमंत्री ने मतदाताओं को दिया था ।
इसी विश्वास के बल पर अजेय बहुमत के साथ डोनाल्ड ट्रंप जिन्हें कभी विदूषक और कभी दुनिया के लिए खलनायक घोषित किया गया आज दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र के मुखिया बन चुके हैं।

ईश्वर डोनाल्ड ट्रंप को  अच्छा स्वास्थ्य दे, उन्हें घर और बाहर में सशक्त बनने में सहयोग करे, स्पष्ट दृष्टि दे जिसके बल पर वे हमारे समय की समस्याओं का समाधान ढूंढ पाएं।

दूसरी ओर स्वदेश भारत में आज 9 नवंबर 2016,  कार्तिक शुक्ल नवमी को पुराने पांच सौ, एक हजार के नोट अप्रासंगिक बन गए। इतिहास बन गए। 

इस अर्थ में अक्षय नवमी देश की अर्थव्यवस्था के लिए काले धन से मुक्ति की दिशा में अक्षय तिथि साबित हो हम कामना करें।

अंधकार के बिना अस्तित्व असंभव है पर अंधकार जब अस्तित्व के लिए चुनौती बन जाए तो एक दीपक सघन अंधेरे में भी रौशनी के लिए पर्याप्त है। 

हम रौशनी के साथ चलें। सत्य के साथ चलें। अपने समय की समस्याओं के समाधान के लिए मिल कर प्रयास करें।

संगच्छध्वं.............

आइए हम मिल कर साथ चलें। 

साथ मुस्कुराएं

  
























Smog buster naturally by Vaidik Science

https://www.youtube.com/watch?v=72QwEmPd46E


    

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

संदेश दीपावली के, लौ लगाए रखना दीप जलाए रखना Devoted to Dr Gyan Singh Gaudpal and Team AIG

दीप 
जलाए रखना 

लौ 
लगाए रखना

तन 
अपना तपेगा

मन 
अपना जलेगा

आस 
बचाए रखना ।

झिलमिलाते
सतरंगे सपनोंं में

चुन लो 
वह एक 
जो है नेक
बस एक 

इस एक 
को  
संजोए रखना 
मिल जाए
तो 
संभाले रखना 

मिल गया जिस पल
खिल उठे हर पल .

मन प्राण गाए गीत
तन तरंगित पाए मीत
हो उमंगित गाए गीत 

इस पल
उस पल
पल पल
हर पल 

लौ लगाए रखना 
दीप जलाए रखना 


कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की सुबह

धूसर 
आसमान

हैं 

ये हमारे 

घर आंगन ?

युद्ध का मैदान ?

गंदला 
आसमान 
बारुदी महक  
सीने में धमक 

कहर कुदरती ?
हमारी दास्तान ?

ज़हरीली हवा 
दुश्मनों की फ़ौज ?
हमारी मौज ? 

लौ 
लगाए रखना
दीप जलाए रखना 

तन 
अपना तपेगा
मन 
अपना जलेगा 
आस
बचाए रखना ।

लौ लगाए रखना
दीप जलाए रखना
सुबह होने तक
उम्मीद बनाए रखना 

Devoted to Dr Gyan Singh Gaudpal and Team AIG 

दीपावली पर हमारा दीप जलाओ अभियान  
जारी रहेगा
लक्ष्य पाने तक
हमारी सांस थमने तक
बारुदी धमाका बंद करने तक