गुरुवार, 16 नवंबर 2023

दीवाली २०२३ पर प्रदूषण अपेक्षाकृत कम फैला है

 आज १३ नवंबर २०२३ है और मेरे नजरों के सामने है खुला आसमान जिसमें दोपहर डेढ़ बजे के आसपास स्मॉग हल्का सा है। हवा साफ नहीं है। मेरे पास प्रदूषण का स्तर या कहें कि हवा की शुद्धता का स्तर जाँचने की मशीन या कोई उपाय नहीं है।प्रदूषण है लेकिन अपेक्षाकृत कम है। दमघोंटू जहर आसमान में छाया हुआ नहीं है।

वर्ष २०१६ से प्रत्येक वर्ष वायुप्रवाह का एक पैटर्न आश्विन और कार्तक महीने में अनुभव कर रहा हूँ मैं। २०१६ में नोटबंदी के दिन से प्रदूषण की स्थिति गंभीर होनी शुरु हुई थी  और आज तक प्रत्येक वर्ष अक्टूबर महीने के अन्तिम सप्ताह से लेकर दिसंबर के पहले स्पताह तक वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर रहती है।


१३ नवंबर को उपरोक्त विचार लिखे गए थे और इसे प्रकाशित आज  किया गया है।

आज १७ नवंबर है जब मैं इसे प्रकाशित करने के लिए अंतिम रूप दे रहा हूँ । उचित है कि स्वतंत्र रूप में यहाँ से आगे की बात अलग पोस्ट में दर्ज करूं।  



शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

छोटी दीवाली 2023 पर ड्रीम द्वारका मिशन प्रगति रिपोर्ट



 तो 

कहना बस इतना है 

कि 

सपने मरे नहीं हैं 

बीज अभी भी सुप्तावस्था से निकलकर अंकुरित होकर पौधा बन पल्लवित पुष्पित नहीं बना है। बीज जिन्दा है।

इस बीच क्या हुआ है वह आज छोटी दीपावली पर रखना उचित लग रहा है। मैं अक्सर शुभ दिन और मुहुर्त की प्रतीक्षा करता हूँ। यह जीवन प्रतीक्षा में ही निकल नहीं जाए यह चिन्ता भी लगी रहती है पर ड्रीम द्वारका के लिए जो कुछ हो सका है वह रखना अच्छा लग रहा है।

लगभग छह वर्ष पहले (2016-2017) मैंने आँवले के कुछ बीज अपनी छोटी सी बालकनी में प्लास्टिक के छोटे से कप में उगाने के लिए रखे थे। कुछ अंकुरित हुए। इनमें से दो उचित जगह पर लगाए गये। एक हमारी शक्ति स्वरूपा जीवन संगिनी अंशु जी ने अपने कार्यस्थल दक्षिण पश्चिम दिल्ली के ककरौला गाँव स्थित प्राथमिक विद्यालय परिसर में लगाए और एक पौधा उनकी ही सहयोगिनी महिला कर्मी अपने घर के निकट के मन्दिर के लिए माँग ले गयी थी। इन दोनो पौधों ने इस वर्ष फल देना शुरु कर दिया है।

ध्यातव्य हो कि वर्ष 2015 में अक्षय नवमी तिथि के आसपास  भारत वर्ष की सांस्कृतिक, शैक्षिक और धार्मिक राजधानी काशी नगरी में हमने ड्रीम द्वारका परियोजना का सपना संजोया था । महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इंजीनयरिंग संस्थान के अतिथि आवास में भोलेनाथ की नगरी माँ काशी के आँचल तले ड्रीम द्वारका मिशन का सपना देखा गया था।  और वापस दिल्ली लौटकर औपचारिक रूप से इसकी घोषणा इस मंच पर कर दी गई थी।

और आज दो ही सही आंवला के पौधे फल देना आरम्भ कर हमारे सपने को जिन्दा रखे हुए हैं।      


रविवार, 11 जून 2023

डिजिटल मंच पर पावन का प्रवेश

पावन एक एप आधारित तन्त्र है जिसका उद्देश्य अपने नाम की तरह ही लोगों के जीवन को पावन तरीके से सुखमय बनाना है। कुछ युवा उद्यमियों द्वारा स्थापित यह एप जीवन से जुड़े विविध पक्षों पर लोगों को सकारात्मक जानकारी देता है। इस पर रखे गए अधिकांश तथ्य मुझे वास्तविक जीवन से जुड़े लगे हैं। 

प्रत्येक जीव और विशेष रूप से हम सभी मानवों का लक्ष्य स्वस्थ तन और प्रसन्न मन पाना है। इन दो लक्ष्यों को पाने के क्रम में ही सृष्टि और जगत के लगभग सभी अन्य लक्ष्य आ जाते हैं।   

हमारी समस्या सबसे बड़ी यही है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक चेतना का विकास होने के बाद से ही तन को सदैव इच्छानुसार स्वस्थ और मन को हर स्थिति में प्रसन्न रखना अधिकाँश लोगों के लिए संभव नहीं होता।

मेरी मातृभाषा मैथिली में एक कहावत है  

राजा दुखी प्रजा दुखी जोगी के दुख दुन्ना ।

आशय राजा और प्रजा दोनों दुखी हैं और जोगी जो घर परिवार के झँझट से मुक्त हो चुका कब का उसका दुख दूना है। समकाल के जोगियों को देखकर अक्सर मुझे जबर्दस्त हँसी आती है।

ठीक कबीर की तरह जो कहते हैं पानी बीच मीन पिआसी , सुन-सुन मोहे आवत हाँसी। यानि मछली पानी में है और प्यास से मरी जा रही है जिसे देखकर मुझे हँसी आ रही।

बात बिल्कुल ठीक है। हम आप सभी में से अधिकांश इसी मछली की तरह हैं जो अपनी अतृप्त प्यास के लिए भटकने को अभिशप्त है।  

पावन पर उपलब्ध सामग्रियों को देखकर लगा कि ऐसे अतृप्त लोगों के लिए, वास्तविक पीड़ा भोग  रहे लोगों के लिए पावन एक अच्छा विकल्प बन सकता है। डिजिटल मंच पर पावन का प्रवेश एक नजर में मुझे सुखद लगा है। अभी हाल ही में मुझे इस एप के बारे में जानकारी मिली। और जानकारी के लिए आप भी एप डाउनलोड कर सकते हैं। 


गुरुवार, 5 मई 2022

अरिपन फाउन्डेशन दरभंगा क, रहल अछि नीक काज, कृत्रिम बुद्धि यानि एआई के होयत प्रयोग ओ मैथिली बनतीह ग्लोबल

 अरिपन फाउन्डेशन दरभंगा क प्रतिनिधि संजय बाबू विगत दिन फोन कएलनि । कहलनि जे अहांक संपर्क सूत्र फलना ठामसं भेटल अछि । हम सब  कृत्रिम बुद्धि यानि एआई प्रयोग के ल,क, आइआइटी मद्रासक संग सहयोग कएलहुँ अछि ।  मैथिली भाषाक उपयोगके सार्वजनिन ओ सार्वकालिक बनेबाक लेल हम सब काज क, रहल छी। एहिमे अहांक सहयोग हमरा सबके चाही । 

एकटा ईमेल सेहो कएलनि आ विस्तृत जनतब दैत एहि अभियानसं जुड़बाक आग्रह कएलनि । योजना हमरा पसंद आयल । कारण तकनीकक स्तर पर मैथिली पछुआयल छथि । चौपाड़ि ओ दरबारी संस्कृति एखनो मैथिलीकें गछाड़ने छनि आ बाबानाम केवलम संग बन्धु बांधवी, जमाय ससुर गठबंधन हावी अछि । फलस्वरूप मैथिली पाछू मुंहे घुसकुनिया दैत मात्र एक दू जातिक भाषा बनि सिमटि गेल छथि ।  

एआई उपयोग एक झटकामे मैथिलीक जमीन ओ अकासमे परिवर्तन आनि सकैत अछि । मिथिलाक सभ वर्ण ओ क्षेत्रकें एक सिनेहिया बन्हनमे बान्हि सकैत अछि । मुदा की अरिपन, एहिमे सक्षम होयत .....

हम मानैत छी, भ, सकैयै । जं अरिपन फाउन्डेशन इमानदारीसं प्रयास करय । ठीक-ठाक लोक,क संगौर करय । जे अवसर भेटि रहल छैक तकर भरपूर दोहन करय तं संभव अछि । की , कोना ......ताहि पर विचार राखब बादमे । एखन समयक दबाव अछि तँय मात्र संकेत रूपमे लिखलहुँ अछि। 

एआई उपयोगसं कोना होयत मैथिली भाषाक विकास ओ लोक एकजुट होयताह ताहि पर विचार बादमे राखब।

हम हुनक टीम संग जुड़बाक स्वस्ति देलियनि अछि । औपचारिक आवश्यकता काल्हि देर राति पूर क, समाद द, देलियनि । आब देखी, कहियासं बनैत अछि संग काज करबाक सुयोग।


इति शुभम ।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

कोरोना के कोहराम और वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच 25 मार्च 2020 को शुरु हो रहा है नव संवत्सर , कीजिये जमकर स्वागत


Ø Dream Dwarka Mission
Ø Ramayan Express
Ø Muskan Mail
Ø Khabar Dilli
Ø FaceNFacts

Invite you to celebrate Bhartiya Logon Ka Bhartiya Nav Varsh

              विक्रम संवत 2077
   जय हिंद     जयति भारतवर्ष     सच्चे भारतवासी बनें

भारतीय संस्कृति के अपने कैलेंडर के बारे में जानें और इसका स्वागत करें । 25 मार्च 2020 बुधवार से नव भारतीय वर्ष शुरु हो गया ।

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानि प्रतिपदा को सृष्टि का आरंभ हुआ। भगवान विष्णु का प्रथम अवतार इसी तिथि को हुआ । सनातन धर्म में आस्था रखने वाले संपूर्ण भारतवर्ष के लोग इसे अपने अपने तरीके से मनाते हैं लेकिन जागरुकता के अभाव में खुल कर एक दूसरे को बधाइयां नहीं देते।

ड्रीम द्वारका मिशन, रामायण एक्सप्रेस, मुस्कान मेल, खबर दिल्ली और फेसएनफैक्ट्स की ओर से हम आप सबको भारतीय नव वर्ष की बधाईयां देते हैं।
नव वर्ष मंगलमय हो, शुभ हो
वैश्विक कोरोना महामारी के भय और आर्थिक संकट की आशंकाओं के बीच हम सबका उत्थान हो ।   


रविवार, 31 दिसंबर 2017

मुस्कान मेल पैग़ामः पौष पूर्णिमा पर नवल वर्ष 2018 की हार्दिक मंगल कामना



01-01-2018

सोमवार है आज 
सोम यानि चंद्रमा
आज पूरे शवाब पर है चांद 
पूरनमासी है
व्रत है 
हमारा आज

व्रती की कामना 

आज के चांद की तरह रौशन रहे आपके चेहरे पर हर वक्त नूर
दूज के चांद से पूर्णिमा के चांद की तरह लगतार बढ़ती रहे आपकी आमदनी
साल भर
।।
पूरनमासी के चांद से अमावस की यात्रा की तरह 
घटते रहें 
जीवन के हर दुःख
संताप
साल भर
।।
हम और आप 
मुस्कराते रहें 
साल भर
।।

उछाह ले मन में तरंगे 
सागर की लहरों की तरह
आज के चांद को 
पूर्णिमा के चांद को 
चूमने के लिये
लगा दें पूरा जोर
तन स्वस्थ मन प्रसन्न ले हिलोर
साल भर
।।
नया साल मुबारक हो
जल की तरह
वायु से करें होड़
अग्नि को लें थाम
गगन के विस्तार को दे चीर
धरती समान चलते रहें
सभी संतति को सहेजे
हम और आप
।।
शुभकामना
नव वर्ष की 
मुस्कुराते रहें 
साल भर
हम और आप
मुस्कान मेल पैग़ाम 
मुस्कुराते रहो
साल भर



पुनश्चः 

प्रीव्यू में प्रकाशन पूर्व देखा तो
तिथि 31 दिसंबर 2017
पर द्वारका दिल्ली, भारत में इस वक्त 
प्रातःकाल के दस बज कर दस मिनट हमारी घड़ी अनुसार
अतः नया साल हमारा हो चुका 
मुस्कुराते रहो

शनिवार, 4 नवंबर 2017

कार्तिक पूर्णिमा 2017 पर पुस्तक व्रत विज्ञान सत्य मिथ पाखंड का प्रथम प्रारूप प्रकाशित

व्रत विज्ञान पुस्तक उद्देश्य
यह किताब हम क्यों पढ़ें

व्रत से सत्य की यात्रा आसान नहीं हैं । ये व्रत लेना अपने हाथ में भी नहीं है । सत्य की तलाश की ओर हर व्यक्ति चलता भी नहीं ऐसे में अहम सवाल है यह पुस्तक आप क्यों पढ़ें ?
मेरे लिये भी यही संकट है । अपने व्रत से जो कुछ मुझे मिला वह आप तक मैं क्यों पहुंचाउं ? इससे मुझे क्या लाभ मिलेगा ?
    
   जो कुछ इस पुस्तक में दर्ज किया गया है वह आपके लिये कितना उपयोगी है ? इसमें कहे गये तथ्य कितने भरोसे के लायक हैं ? क्या आपको इन पर विश्वास करना चाहिये ? इनमें कहे तथ्य, स्वयं पर आजमाने से आपके तन और मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
व्रत के प्रति आस्था क्यों रखें ?

आदि आदि ?

अनेक सवाल हैं ? 

???

इन सवालों को मन में उठने दीजिये । अपने अंदर से जवाब खोजिये । जिन सवालों का जवाब नहीं मिले वह हमसे अवश्य पूछिये।

मेरी ओर से यह किताब आप तक पहुंचना एक अनिवार्यता है । यह मेरे ही नहीं अपने पूर्वजों के अस्तित्व, गुरुओं के ज्ञान और उनके तप को आप तक पहुंचाने की विवशता है।

जो कुछ स्वाध्याय से , अपने तन पर प्रयोग से, मन और चित्त के विश्वास, आस्था और समर्पण से प्राप्त हुआ है वह इसी जन्म में विसर्जित किये बिना मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।
इसलिये मुझे जो कुछ मिला है वह आप तक पहुंचाना है।

ईशोपनिषद के सभी श्लोक महत्वपूर्ण सूत्र हैं । इनमें से कुछ सूत्र जो मुझ तक अपना अर्थ कह रहे हैं वह मुझे चैन से नहीं जीने देगा जब तक मैं इन्हें आप से बांट नहीं लूंगा ।
विद्यां च अविद्यां च यस्तद्वेदोभय ऊँ सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या ऊं रताः ॥ १२॥
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३॥
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय ऊं सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४॥

 मेरे अर्थ आप भी स्वीकार करें और अपने जीवन में उतारें यह आवश्यक नहीं है। इसे वही स्वीकार करेगा जिसे इसकी जरूरत होगी । इसे स्वीकार कर वह प्रतिबद्ध होगा / होगी उन विचारों के लिये कर्ममय जीवन बिताने के लिये  जो सबके लिये मंगलकारी हैं।

आज चार नवंबर 2017 है । आज कार्तिक पूर्णिमा है । आज स्नान और संकल्प के साथ व्रत और उत्सव से जुड़े व्यापक आधार पर मनाये जानेवाले अनेक पर्व हैं।

पर आज की तिथि 
औरंगजेब का जन्म दिवस भी है। औरंगजेब जिसने भारतवर्ष में उसके समय में मनाये जाने वाले अनेक पर्व – त्यौहारों को बदल कर एक समाज, एक समूह में बदलने के लिये अथक प्रयास किये ।

अनेक क्रूर कर्म उसके नाम हैं जिसका पूर्ण फल उसे मिला है ।

भारतीय समाज जैसा कल था । वैसा आज भी है । जितने व्रत त्यौहार और उत्सव उसके समय में थे उनमें कुछ बढ़े ही हैं, घटे नहीं हैं।

औरंगजेब भारत वर्ष के लिये नायक है या खलनायक इसकी विवेचना करते हैं ईशोपनिषद के ऊपर दिये गये सूत्र ।

 विद्या और अविद्या दोनों साथ – साथ हर समय कार्यशील और गतिमान रहते हैं । विद्या और अविद्या की उपासना   के फल अलग - अलग हैं पर जो धीर हैं, समझदार हैं वे दोनों की उपासना करते हुए एक दूसरे के सहयोग से अपना लक्ष्य प्राप्त करते हैं।

विद्या होने पर उसे अपने पास रोके रखना मना होता है। अविद्या के साथ चलना मना होता है। संभूति और असम्भूति की उपासना करने वाले और इसके विरोध में चलने वाले दोनों का अस्तित्व बना रहता है।

धीर और विद्वान को संभूति के साथ चलना चाहिये अन्यथा अंधलोक में स्थान मिलता है। ये जो अंधलोक है उससे मुक्त होकर प्रकाश में चलने का पर्व  है आज ।

आज 4 नवंबर 2017 है । देव दीपावली के साथ अनेक भारतीय व्रत, पर्व और उत्सवों के साथ औरंगजेब की जयंती।

प्रकाश पर्व है आज । सिक्खों के आदि गुरु नानक देव की जयंती।

दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भारतीय संतान की जयंती पर इस किताब के प्रथम प्रारूप को स्वान्तः सुखाय प्रकाशित किया जा रहा है। 

इसमें संशोधन, परिवर्धन, जोड़ – घटाव की प्रक्रिया अगली पूर्णिमा यानि अग्रहायन पूर्णिमा से पहले तक चलेगी । अगहन पूर्णिमा को इस किताब के अंतिम प्रारूप का   प्रकाशन हो जायेगा।

4 नवंबर 1618 में पैदा हुआ औरंगजेब मुग़ल ख़ानदान का आखिरी सबसे प्रकाशमान चिराग था । इस्लाम धर्म में पैदा हुए औरंगजेब ने पूरी इमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ व्रत किया ।
अपने धर्म के प्रचार और प्रसार के लिये जो कुछ संभव हो सकता है उसने किया। पर अपने व्रत पर टिके रहने, दीन ईमान पर चलने का उसको क्या फल मिला ?

औरंगजेब विदेशी नहीं था । इसी भारत वर्ष में उसके बाप , दादा - परदादा पैदा हुए जिन्होंने यहां के धर्म, यहां के लोगों की आस्था और विश्वास के साथ तालमेल बनाते हुए अपना जीवन –यापन किया।

उसके पिता शाहजहां के शासन काल में सेना के विभिन्न पदों, दरबार के महत्वपूर्ण पदों और प्रशासनिक इकाइयों में हिंदुओं की तादाद 24 फीसदी थी जो औरंगजेब के शासनकाल में बढ़ कर 33 फीसदी पर पहुंच गयी। ( स्रोत हिंदुस्तान दैनिक समाचार पत्र 04-11-17 दूसरा पृष्ठ )

औरंगजेब अपने बाप, दादा और परदादा से अलग व्यक्तित्व वाला था । आजीवन उसने शराब नहीं पी।  ऐयाशी और अश्लील नाच गाने से दूर रहते हुए उसने अनेक प्रशासनिक सुधार किये जिससे आम लोगों का जीवन बेहतर हो। अपने भरण पोषण के लिये टोपियां सिल कर और तथा कुरान की प्रतिलिपियां तैयार कर बेचने से जो आय होती उसी से निर्वाह करता था। 

 ये ऐतिहासिक तथ्य हैं जिनकी पुष्टि अनेक तत्कालीन संदर्भ ग्रंथों से होती हैं ।

 दूसरी ओर औरंगजेब अपने दीन पर चलने वाला एक अंधा व्यक्ति था जिसने अपनी आस्था और विश्वास में बलपूर्वक दूसरों को दीक्षित करने के लिये भयानक अत्याचार किये।

विद्या और अविद्या को समझने वाले, संभूति और असंभूति के साथ चलने वालों को मिलने वाले फल को समझने के लिये बस एक उदाहरण गुरु तेगबहादुर का यहां प्रासंगिक है।

सिक्खों के नवें गुरु तेगबहादुर के पास जब अपने धर्म की रक्षा के लिये कश्मीर से चल कर हिन्दुओं का एक दल औरंगजेब का संदेश लेकर आया तो भरे दरबार में सब सोच विचार में पड़ गये।
क्या था औरंगजेब का संदेश ? धर्म के लिये अपने प्राणों की बलि देने वाला कोई है तो सामने आये । धर्म के नाम पर अपनी आहुति दे ।

आत्म उत्सर्ग का विचार नाचिकेत अग्नि से परिचालित एक बालक गोविन्द राय ने अपने पिता सिक्खों के नवम गुरु तेगबहादुर को दिया।

सनातन भारतीय संस्कृति का वाहक ऋषि वाजश्रवा  विश्वजित यज्ञ के बाद उचित दान नहीं देता है तो उसका बेटा पिता को पापकर्म से बचाने के लिये समुचित दान याचकों को देने का आग्रह करता है। पिता फिर भी नहीं  माने तो बार बार अनुरोध करता है । अंततः उसके सवालों से चिढ़कर पिता  अपने  बेटे नचिकेता को मृत्यु को दान कर देता है।

मृत्यु के स्वामी यमराज को प्राप्त कर नचिकेता सत्य को समझता है और सत्य का प्रसार आजीवन करता है। यह व्रत से ही संभव हुआ।

दस वर्ष के गोविन्द राय उसी नाचिकेत अग्नि से परिचालित भारतीय संतान जिन्होंने अपने पिता को आहूति देने की प्रेरणा दी । अपनी संतानों को आहूति पथ पर अग्रसर किया। आजीवन व्रत पथ पर सत्य संधान करते रहे।

औरंगजेब भी भारतीय । यहीं के पंच तत्वों से तन निर्मित हुआ यहीं खाक में मिल गया। आज उसकी जयंती पर उसे याद करना प्रासंगिक । उसे असंभूति की उपासना का फल मिला।

संभूति यानि अपने समान सबको समझना, उसके सुख दुख की चिंता करना और असंभूति यानि अपने से अलग समझ कर दमन करना और उसे बदलने का प्रयास करना, नष्ट करने के लिये अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना ।

संभूति और असंभूति की अनेक व्याख्या अनेक ग्रंथों में अलग अलग विद्वानों की मिलेगी और हर विद्वान अपने सत्य पर अटल मिलेगा।

पर 
सत्य एक बिन्दु है 
जिसके उतने ही अंश को कोई भी प्राप्त कर सकता है जितने का वह योग्य अधिकारी पात्र हो । उससे अधिक सत्य उसे नहीं मिलता ।

अक्षर और अक्षरों से बने शब्द, पद वाक्य का अर्थ हम पर आप पर बस उतना ही खुलेगा जितने की हमें आवश्यकता है , जितने के योग्य पात्र और अधिकारी हम हैं । उससे अधिक नहीं।

एक वैदिक मंत्र है
उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम ।
उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ।।ऋगवेद 10-71-04

इसका सरल सा अर्थ है हम देख कर और सुन कर भी वाणी का वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते हैं, हम वह समझते हैं जो समझना चाहते हैं जबकि उसका तात्पर्य बिल्कुल अलग हो।
          
समकाल में प्रतिदिन अनेक तथ्य सत्य – असत्य, कहानियां , सच्ची, झूठी, हमारे पास आ रही हैं। हमारा जीवन इनसे प्रभावित हो रहा है। हमारी आंखो पर टेलीविजन से दिखाया जा रहा सत्य और खबरिया माध्यमों से चलकर आया हुआ तथ्य पहुंच रहा है। इन्हीं से हमारा जीवन परिचालित हो रहा है।
     धर्म, आस्था , विश्वास और परंपरा के नाम पर हम तक पहुंचने वाली सूचनाओं का वास्तविक लक्ष्य जाने बिना हम एक उन्मादी समाज के रूप में बदलते जा रहे हैं।

स्वास्थ्य रक्षा के लिये बाजार के पंडित और मायावी गुरु तरह- तरह के स्वांग रच कर हमें लुभा रहे हैं। स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का लक्ष्य हर किसी का है। इसी दावे के साथ प्रत्येक उत्पाद आपको परोसे जा रहे हैं ।

शिक्षा का लक्ष्य केवल पेट भरना और मजे लेना रह गया जिसे प्राप्त कर ना तो हम स्वस्थ रह पा रहें हैं और ना जीवन का आनन्द मिल रहा है।

ऐसे में व्रत विज्ञान सत्य मिथ पाखंड आपको उन्मादी बनने से रोक सके इसलिये आपके हाथों में है। आप स्वस्थ रह सकें और अपने पास उपलब्ध संसाधनों से अपने तन को सबल बना सके इसलिये यह किताब आपके पास पहुंच रहा है।

वसंत के समान सुखद हर मौसम आपके लिये हो,  आप हर दिन उत्सव मना सकें इसलिये यह किताब आपके हाथों में है। आप आनंदित रहे हर पल इसलिये यह किताब आप पास है। ,   
  
  व्रत की परंपरा दुनिया के सभी धर्मों मे है । किसी में कम किसी में ज्यादा । धर्म के बिना रहने वाले लोग आज भी दुनिया की कुल आबादी में मात्र पंद्रह प्रतिशत हैं।

पर ये पंद्रह प्रतिशत भी सनातन भारतीय सोच की दृष्टि से धार्मिक हैं जिनका कोई स्पष्ट देवता नहीं है। उपासना की स्पष्ट पद्धति नहीं है पर ये भी व्रत के सिद्धान्तों से ही परिचालित होते हैं । व्रत इन पर भी लागू होता है।

यह किताब आपको हर तरह के अंधविश्वास से मुक्त होने में सहायता करेगी। आपको अपने धर्म में स्थिर रहते हुए अपने विश्वास और परंपरा के साथ चलते हुए अपने तन को स्वस्थ और मन को प्रसन्न रहने में सहायता करेगी।

   स्वामी विवेकानंद ने आज से लगभग सवा सौ साल पहले कहा था “ महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यजनक सत्य मैंने अपने गुरुदेव से सीखा, वह यह कि संसार में जितने धर्म हैं, वे परस्पर – विरोधी या प्रतिरोधी नहीं हैं – वे केवल एक ही चिरन्तन शाश्वत धर्म के विभिन्न भाव हैं  मात्र हैं। ( स्रोत - मेरी जीवन कथा – स्वामी विवेकानंद,  हैं ।  यही एक शाश्वत धर्म चिरकाल से समग्र विश्व का आधार स्वरूप रहा है और चिरकाल तक रहेगा ; और यही धर्म विभिन्न देशों में विभिन्न भावों में अभिव्यक्त हो रहा है।”

स्रोत - मेरी जीवन कथा आत्मकथात्मक उक्तियों का संकलन – स्वामी विवेकानंद प्रथम संस्करण 2014 )
    
  मुझे भी अपने  व्रत से यही सत्य प्राप्त हुआ है। इसी का प्रसार करते हुए मनसा वाचा कर्मणा यह पुस्तक आपके हाथों में है।
आनन्द लीजिये ।
इति शुभम
देव दीपावली

4 नवंबर 2017

यह पुस्तक क्यों पढ़ें इस शीर्षक से यह आलेख आज ही लिखा गया है । पुस्तक में अंतिम प्रकाशन के समय सम्मिलित किया जायेगा।


देव दीपावली आपके लिये मंगलमय हो