शनिवार, 2 अप्रैल 2016

वनस्पति और प्राणि जगत के संबंधों के बारे में वर्ष 2016 के दो रोचक उदाहरण

जीव जगत के दो महत्वपूर्ण सदस्य प्राणि और वनस्पतियों की बीच अंतर्संबंध के बारे में हम अधिकांश मानवों के प्रयोग सतही, निष्कर्ष अधूरे और अनुभव बेहद कम हैं। दरअसल एक जन्म में बिना गहन अभ्यास और प्रयोगों के  लगातार जारी रखे इन संबंधों को समझना कठिन होता है। ना तो हम अपना प्रयोग लगातार जारी रखते हैं और ना ही उनको समझने का प्रयास करते हैं।

 ये प्रयोग हमारे अपने तन - मन और प्राण तथा वनस्पति के तन मन और प्राण के स्तर पर होंगे तभी इनका अंतर्संबंध पकड़ में आना शुरु होता है।

 दूसरों द्वारा किए गए अधकचरे प्रयोग के नतीजों को हम, ना केवल स्वीकार कर लेते हैं बल्कि पूरे विश्वास के साथ इस पर अनंत बहस के लिए तैयार रहते हैं क्योंकि यह  हमारे सामने विश्वसनीय स्रोतों से आया हुआ दीखता है। यह दीखना अक्सर हमारे भ्रम पर आधारित होता है।

हम भ्रम से मुक्त तब  हो सकते हैं जब दूसरों के किसी भी निष्कर्ष को तब तक नहीं स्वीकारें जब तक वह हमारा अपना अनुभव नहीं बन जाए। अपने प्रयोग की कसौटी पर वह खरा उतरे तभी उसे अपनाएं और आगे बढ़ाएं।

वर्ष दो हजार सोलह के दो प्रयोग हम आपसे यहां साझा कर रहे हैं। इन पर आप भी प्रयोग कर सकते हैं और नतीजों को आजमा सकते हैं। ये दोनों प्रयोग मेरे सामने घटित हैं । मेरे साथ कई अन्य लोग भी इसके साक्षी हैं इसलिए आप चाहें तो इन विचारों की पुष्टि के लिए मेरे अलावा अन्य लोगों से घटनाओं का ब्यौरा ले सकते हैं।

मेरे एक मित्र हैं। देश की राजधानी दिल्ली में द्वारका में उनका कार्यालय है। चौथी मंजिल पर अपने कार्यालय में अपनी कुर्सी के साथ लगी एक खिड़की के बाहर बने चबूतरे पर उन्होंने छोटे - छोटे कई गमलों में पौधे लगा रखे हैं। इन पौधों को पानी देना उनके कार्यालय आने के रूटीन से जुड़ा हिस्सा है। ये गमले वाकई छोटे हैं। इनका व्यास और गहराई छह ईंच से अधिक नहीं है।

वे सिर्फ इन्हें पानी नहीं देते बल्कि जब इन्हें पानी दे रहे होते हैं तब बातचीत भी कर रहे होते हैं। यह बातचीत मूक अवस्था में होती है। इसे आप एकालाप भी कह सकते हैं क्योंकि पौधे का जवाब मानव सुन सकें ऐसी मशीन की व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है। इन पौधों को लगाना और  पानी देना उन्होंने खुद अपने हाथों से किया है इसलिए अन्य कर्मचारियों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे इसे पानी दें।

जनवरी 2016 में मेरे इन मित्र को दस ग्यारह दिनों के लिए  बाहर जाना था। जिस दिन वे बाहर जाने वाले थे उससे एक दिन पहले मैं इस कार्यालय में उनके साथ था। अन्य कर्मचारी घर लौट चुके थे। मेरे मित्र ने अपने कार्यालय को बंद करने से पहले पौधों को पानी देने के मसले पर गंभीरता से चर्चा की और मुझसे यह जिम्मेदारी निभाने को कहा। मैंने स्वीकार भी किया और तय हुआ कि उनकी अनुपस्थिति में मैं इन पौधों की खोजखबर लेता रहूंगा। मेरे इस मित्र ने मेरे अलावा कुछ और साथियों से यही आग्रह किया था कि पौधों को समय - समय पर पानी डालते रहें।

लेकिन संयोग ऐसा बना कि इन पौधों को किसी ने पानी नहीं दिया। आप सोच सकते हैं कि लगभग 10 बारह दिनों में उन पौधों को जिन्हें नियमित पानी की आवश्यकता हो उनकी क्या दशा हुई होगी।

जिस दिन वे लौटे मैं उनके कार्यालय में उनके साथ ही पहुंचा और पौधों की दशा देख कर उनका दुख देखने लायक था।

हर गमला सूखा पड़ा था। पानी के अभाव में एक पौधे को छोड़ कर बाकी सब झुलस चुके थे।

पश्चाताप की पराकाष्ठा फूट फूट कर रोने से मानी जाए तो वे बिचारे आंसू तो नहीं बहा रहे थे मगर बिना आंसू बहाए रुदन पूरे दिन जारी रहा था।

बार बार कह रहे थे कि मेरे हाथों इनकी हत्या हो गई। मेरी गलती से ये मौत के शिकार हो गए।

जब पाश्चाताप इस स्तर का होता है तो हत्या होने के बाद भी प्राण लौट सकते हैं वनस्पतियों के इसका साक्षात उदाहरण हमने देखा। उनके गमलों के अधिकांश पौधे आज यानि दो अप्रैल 2016 तक वापस लौट चुके हैं। सिर्फ एक पौधा सूख गया लेकिन बाकी सभी में पिछले सबा  महीने के दौरान जीवन लौट आया है।

इनमें फालसे के एक दर्जन से अधिक पौधे हैं। ये फालसे के पौधे उन बीजों से पनपे जो फल उन्होंने अपने मित्रों के साथ खाए थे और बीज को कूड़े की तरह फेंकने के बदले कागज पर समेट कर रख लिया था और छह इंच व्यास और चार पांच ईंच गहराई वाले गमले में लगा दिया था। ये दस बारह पौधे एक छोटे से गमले में किस तरह इठलाते मुस्कुराते हैं और कैसे पूरी तरह सूखने के बाद फिर से  प्यार -दुलार पाकर पनपे नए पत्तों के साथ झूम रहे हैं आप भी देख सकते हैं उनके कार्यालय में आकर।  

प्राणि और वनस्पतियों के बीच अंतर्संबंध का यह एक ताजा उदाहरण है।

अब दूसरा उदाहरण दूंगा।

द्वारका में ही अपने आवास में हमने गमले में आवंला के कई बीज जनवरी 2016 में  डाले हैं। मन में इच्छा यह है कि इनसे पौधे निकलेंगे। इन पौधों को ड्रीम द्वारका अभियान के तहत विभिन्न सोसाइटी, पार्क में लगाया जाएगा। उद्देश्य यह है कि हम जिन वनस्पतियों, पौधों , वृक्षों के फल फूल औषधियों का उपयोग करते हैं वे हमारे इर्द गिर्द होने चाहिए ताकि परिवहन के साधनों पर कम से कम बोझ पड़े।

हम जिस युग में जी रहे हैं उसमें अपनी समस्याओं को ना तो ठीक से देख पा रहे हैं और जब समस्या ही नहीं देख रहे तो समाधान कहां से निकलेगा ?

दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है दुनिया भर में प्रदूषण बढ़ रहा है मगर प्रदूषण के मुख्य कारणों को पहचानने के बदले हम दंडात्मक उपायों से इसे कम करने का प्रयास कर रहे हैं। दिल्ली में ऑड इवन का प्रयोग हो या फिर डीजल गाडियों के रजिस्ट्रेशन पर रोक या फिर दिल्ली आगमन पर टैक्स का बढ़ता बोझ समस्या के हल नहीं हैं। इन सभी कदमों से बहुत अधिक का अंतर नहीं आएगा।

दिल्ली के प्रदूषण को या दुनिया के किसी नगर के प्रदूषण को कम करना है तो हमें ऐसे साधनों का इस्तेमाल करना होगा जो प्रदूषण नहीं फैलाते हों।

यदि हम अपने उपभोग की अधिकांश सामग्रियां अपने एक सौ किलोमीटर के दाएरे में पैदा करें तो प्रदूषण का निदान बहुत हद तक ढूंढ सकते हैं।

आंवले के बीज गमले में लगाना इसी का प्रयास है । यदि हम अपने दैनिक उपभोग के फल फूल सब्जी अपने आवास के इर्द गिर्द पैदा करने की दिशा में बढ़ें तो अनेक बीमारियों से बच सकते हैं। कीटनाशकों यानि जहर से मुक्त उत्पादों के इस्तेमाल से हमारा स्वास्थ्य बेहतर होगा। और आखिरकार मानव ऑरगेनिक फूड के माध्यम से उसी दिशा में तो आगे बढ़ रहा हैय़
 
 बहरहाल वापस लौटें वनस्पतियों और प्राणियों के अंतरसंबंध पर जो इस पोस्ट का मुख्य विचार बिंदु है।

जनवरी में जो बीज हमने डाले उनमें से कोई पौधा अभी एक सप्ताह पहले तक नहीं निकला था। एक पौधे का अंकुर  जो निकला उसे देख कर हमारे मन में विचार आया कि चलो मुझे जन्मदिन का गिफ्ट शायद मिलने वाला है। लेकिन जब उसके पत्ते फूटे तो साफ हो गया कि वह किसी किस्म का घास है। आंवला नहीं।

मन के किसी कोने में उम्मीद थी कि 31 मार्च से पहले पौधे को आना चाहिए। और ठीक 31 मार्च की सुबह हमारे इस गमले में एक आंवले का पौधा निकल आया। जब हमने इसे देखा तो कितनी खुशी मिली उसे शब्दों में नहीं कह सकता। मुझे लगा मेरी इच्छा का ख्याल रखते हुए ये  वनस्पति रूपी जीव हमारे सपने को साकार करने के लिए आए हैं।


खैर हमने पौधे से आग्रह किया कि देखिए आप अपनी सुरक्षा खुद कीजिए क्योंकि आप इतने नाजुक हैं कि मैं किस रूप में आपको सुरक्षित बचाऊं यह नहीं जानता। इसलिए जब आप मेरे जन्मदिन का उपहार बन कर आए हैं तो सही सलामत रहिए और आगे चल कर विशाल वृक्ष का रूप लीजिए।

इस शिशु रूपी कल्पवृक्ष से हमने प्रार्थना की थी 31 मार्च को और फिर इसे दोहराया एक अप्रैल 2016 की सुबह आठ बजे के आसपास लेकिन शाम में जब मैं गमले को देखने के लिए आया तो ये शिशु जा चुके थे। किसी पक्षी ने या किसी अन्य प्राणी ने उनका जीवन ले लिया था । संभव है वो प्राणी गिलहरी हो या फिर कबूतर क्योंकि इन दोनों का आगमन इस गमले के इर्द गिर्द होते रहता है। आंवले के शिशु पौधे के दो पहले पत्ते नीचे गिरे हुए थे। नाजुक लाल तना मानो लहुलुहान था।

मैं पूरी तरह निराश और हताश हो गया कि ऐसा क्यों हुआ ?

क्या आपके पास है इसका जवाब ?

खैर आंवले का एक या दो और पौधे दूसरे गमलों में निकल आए हैं आज सुबह यानि दो अप्रैल 2016 को।

मैंने इनके चारों ओर पतली - पतली सींक नुमा सुरक्षा घेरा लगा दिया है इस उम्मीद के साथ शायद अब कोई पक्षी या अन्य कोई जीव इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाए।

मैं यह मानता हूं कि मेरे आह्वान पर आंवले के पौधे आएंगे और हमारा ड्रीम द्वारका अभियान आगे बढ़ेगा।

क्या आप इस अभियान में हमारे साथ चलेंगे और हमारा सहयोग करेंगे।    


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

ड्रीम द्वारका लोक सेवा का आरंभ रामनवमी 2016 पर

ड्रीम द्वारका पर जितनी सामग्रियां तैयार हुई हैं उनके साथ वर्ष 2016 में रामनवमी तिथि 15 मार्च से लोक सेवा की शुरुआत विधिवत करने की योजना है।

द्वारका के विभिन्न सेक्टरों के बारे में जानकारियों के साथ यह सेवा शुरु हो जाएगी। इसके साथ ही वाट्सएप पर कुछ ग्रुप शुरु होंगे। इसमें शामिल होने के लिए लोगों को निमंत्रण 08 अप्रैल 2016 से देना शुरु होगा। 8 अप्रैल को ही कम से कम दो ग्रुप, वाट्स एप पर शुरु किए जाएंगे।

1 DD Jai Siya Ram 114

2.DD Sanchetna (Awareness)

पहला ग्रुप श्री राम के तीर्थों, मंदिरों, विचारों, प्रासंगिकता, मन केन्द्रित करने के उपायों सहित व्यक्ति के आत्म मुक्ति अभियान पर केन्द्रित होगा।

दूसरा ग्रुप सम सामयिक समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक विविध विषयों पर उपयोगी सूचनाओं पर केन्द्रित होगा।

पहले ग्रुप के माध्यम से जहां व्यक्ति के आत्म कल्याण पर ध्यान देने की योजना है वहीं दूसरे ग्रुप की सहायता से सामूहिक शक्ति को जगाने का प्रयास होगा।

इन दोनों के बारे में विविध जानकारियां 08 अप्रैल से ही मिलनी शुरु होंगी।

प्रतीक्षा करें जब सारी सूचनाएं 08 अप्रैल  को मिलेंगी।

सोमवार, 7 मार्च 2016

महाशिवरात्रि पर्व एक खोज अपने अाप की

आज सोमवार है। वर्ष 2016 का  महाशिवरात्रि पर्व भी आज है।

सोमवार को इस पर्व की तिथि लगभग 12 वर्षों के अंतराल पर आती है। इस तरह आज जैसा योग फिर 12 वर्षों के बाद ही आएगा।

ड्रीम द्वारका योजना के साथ इस तिथि का संयोग क्या अर्थ रखता है ?

दरअसल मैं या हम में से हर वह व्यक्ति अपने अन्तरमन की  खोज की  यात्राएं करता है जो अपने समय की चुनौतियों से टकराता है , इनके समाधान का रास्ता ढूंढने की कोशिश करता है। इन खोज यात्राओं में क्या पाया क्या खोया इसकी छानबीन करता है और छानबीन के नतीजे पर पहुंच कर उनका लाभ वृहत समाज तक पहुंचाने के लिए प्रयास करता है।

ड्रीम द्वारका धर्म के विज्ञान पर मेरी खोजयात्रा का एक पड़ाव है। जो कुछ अब तक धर्म के माध्यम से समझ पाया हूं उसे वृहत समाज के साथ बांटने का प्रयास है। ड्रीम द्वारका योजना के साथ इस तिथि का संयोग अनायास नहीं है बल्कि एक सोची समझी योजना का वह खंड है जिसे अनेक वर्षों में व्रत के अपने तन और मन के साथ प्रयोगों के माध्यम से मैंने प्राप्त किया है।

व्रत लंबे समय से करता आ रहा हूं। बचपन में भी व्रत खुद भी किए और अपने परिजनों तथा परिचितों को व्रत करते देखा। वर्ष 2007 में अगस्त महीने की पूर्णिमा तिथि से सोच विचार के बाद एक बार फिर से नए सिरे से व्रत करने का फैसला हुआ था।

दरअसल ज़ी टीवी ग्रुप के जागरण समूह के लिए व्रत और त्यौहार नाम से एक साप्ताहिक कार्यक्रम की योजना बनी और मुझे यह कार्यक्रम तैयार करने का अवसर मिला।

ऐसे विषय पर मैं बिना अपने व्यक्तिगत अनुभव के कार्यक्रम नहीं बनाना चाहता था इसलिए मैं वर्ष 2007 के अगस्त महीने में पूर्णिमा तिथि से व्रत करने तथा नियमित योग अभ्यास करने के संकल्प के साथ एक शुरुआत हुई। अब तक यह संकल्प जारी है ।

व्रत और योगअभ्यास अब मेरे जीवन के अंग है और दैनिक अभ्यास निरंतर चल रहा है।

व्रत के साथ अपने प्रयोगों के अंतर्गत  विगत वर्ष 2015 में नवंबर महीने में कार्तिक शुक्ल षष्ठी यानि दीवाली के बाद आने वाले छठ व्रत को मैंने किया। हालांकि छठ के साथ जुड़े अन्य अंगों जैसे जल में खड़े होकर अर्घ्य देना और प्रसाद चढ़ाना और बांटना मेरे व्रत के साथ नहीं जुड़ा था।

मैंने छठ का व्रत रखा इसका तात्पर्य यह है कि लगभग चार दिवसीय इस व्रत के शुद्ध व्रत पक्ष को जानने समझने की कोशिश मैंने की।

व्रत के पहले चरण में नहा खा यानि स्नान के साथ व्रत का संकल्प, इसके दूसरे दिन खरना और तीसरे दिन पूर्ण निराहार . जलाहार और इसके अगले दिन प्रातः कालीन उदय हो रहे सूर्य को जलांजलि के साथ व्रत संपन्न किया।    
इसमें ध्यान देने की बात यह है कि मैंने तय किया था कि इस वर्ष जब मैं दिल्ली के द्वारका स्थित सेक्टर 11 स्पोर्ट्स कंप्लेक्स के नजदीक स्थित  छठ घाट पर खड़ा होकर व्रत की समाप्ति पर किसी से प्रसाद नहीं मांगूगा।यह मेरी मनोकामना थी कि मुझे प्रसाद कोई व्यक्ति स्वयं बुला कर दे।

ऐसा ही हुआ । एक नहीं बल्कि दो व्रतियों ने मुझे बुलाकर प्रसाद दिया।

व्रत के साथ मेरे यह प्रयोग पहली बार नहीं थे। इससे पहले भी पराशक्ति के साथ संपर्क साधने की कोशिश और मां प्रकृति के साथ मेरे प्रयोग कई स्तरों पर कई बार हुए और इनमें से अधिकांश में सकारात्मक परिणाम मेरे संकल्पों के अनुसार प्राप्त हुए हैं।

 छठ व्रत के साथ मेरे प्रयोग दरअसल अपने आपकी क्षमताओं को आंकना था कि  व्रत के स्तर पर मेरा तन कितना तैयार है और एक कठिन समझे जाने वाले व्रत को किस रूप में कर पाता है।

मैं अपने तन और मन दोनों की कसौटी पर छठ व्रत में खरा उतरा।

अब महाशिवरात्रि व्रत पर आता हूं।

शिव को अनादि और अनंत माना गया है। कैलाश पर्वत इनका घर माना गया है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यंत पावन मानी गयी है। आज यानि महाशिवरात्रि तिथि  शिव और पार्वती  की विवाह तिथि है।

आज यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या इस तिथि को आज भी विवाह आयोजित करने की परंपरा है ?

क्या श्री राम और सीताजी की विवाह तिथि के अनुरूप इस तिथि को भी क्यों भारतीय जनामनस में विवाह करने के लिए शुभ तिथि नहीं नहीं मानी जाती ?

इस ब्लॉग को पढने वाला कोई भी व्यक्ति इस बारे में मुझे जानकारी दे पाए तो मुझे खुशी होगी।

बहरहाल आज महाशिवरात्रि है और मैंने व्रत रखा हुआ है।

कुछ चित्र मैंने इस ब्लॉग में विभिन्न श्रोतों से लेकर लगाए हैं।

ये चित्र बस यह दिखाने के लिए यहां लगाए जा रहे हैं कि समकाली मानवीय वैज्ञानिक सोच की जो सबसे अधिक उन्नत होने की कल्पना है वह कितनी सतही और अधूरी है।

कैलाश पर्वत के शिखर पर महादेव का आवास माना गया है और आज से बहुत पहले लगभग 1957 में प्रकाशित ग्रंथों में कैलाश के बारे में कहा गया है कि यह अनेक कमल आकार, स्वस्तिक आकार तथा ओम आकार के चक्र से बना हुआ शिखर है जिसके सबसे ऊपर महादेव का आवास है।

गुगल अर्थ से आज भी यदि हम माउंट कैलाश को लोकेट करें तो सुदूर आकाश   से माउंट कैलाश पर्वत एक बड़े से ओम आकार के बीच में बैठा मिलेगा. अनेक स्वस्तिक आकार भी ढूंढे जा सकते हैं और कमल चक्र भी दिख सकते हैं।

इसके अलावा उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के पास ओम पर्वत के नाम से विख्यात चोटी भी है जिसके ऊपर बर्फ से ओम का निर्माण देखा जा सकता है। इसे आदि कैलाश कहा जाता है।

संभवतः आदि कैलाश महादेव का पहला घर है और वर्तमान कैलाश बाद का सुव्यवस्थित घर है।

  
इन दोनों पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा । अभी विषय को विराम देने का समय आ गया है। अगले किसी पोस्ट में इसे फिर से विस्तार दूंगा।

अभी तो बस इन चित्रों को देखिए और सोचिए कि बिना सैटेलाइट फोटो और गुगल अर्थ के चित्रों के और कैमरे का आविष्कार होने से पहले कैलाश और आदि कैलाश के बारे में लगभग ऐसे ही तथ्य किस काल में किस आदमी ने देखे और उन्हें पुराण ग्रंथों में लिख कर बताया कि कैलाश की भौगोलिक स्थिति कैसी है।

वह वर्णन आज उन्नत तकनीक के सहारे कैसे सत्य साबित दिख रही हैं.

बस यही निवेदन करूंगा अपने आप पर गर्व कीजिए। आप धरती के किसी खंड के किसी देश में किसी धर्म जाति और वंश के जीव हों अपने पर गर्व करना सीखिए और हम आप से पहले हमारे आपके पूर्वजों ने किस तरह शिव के रूप में एक ऐसे नायक की कथा लिखी जो सबको साथ लेकर चल सकता है उसे समझ कर अपने जीवन में उतारने का प्रयास कीजिए।

पार्वती ने कितने तप के बाद शिव को पति रूप में प्राप्त किया इसकी याद दिलाती है यह तिथि...

हमारी बेटियां अपने पति को प्राप्त करने के लिए अपने माता पिता के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखती है और आखिरकार उन्हें सहमत कर विवाह करती है उसे याद ताजा करने की तिथि है महाशिवरात्रि......

दांपत्य जीवन के लिए सनातन  भारतीय संस्कृति में  महादेव औऱ पार्वती को आदर्श जोड़ी माना जाता है।
यदि हम अपने दांपत्य जीवन में सुमधुर संबंध चाहते हैं तो इस तिथि की याद बनाएं रखे और इस जोड़ी को अपना आदर्श स्वीकार कर लें।

बस अपने दांपत्य जीवन में शिव पार्वती की असीम कृपा स्वीकारते हुए यह पोस्ट विराम ले रहा है।

   
    



















सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

परिस्थितियों के मद्देनजर धीमी पड़ गई है प्रगति

ड्रीम द्वारका परियोजना अपने लक्ष्य से पीछे चल रही है। वर्ष 2016 में  वसंत पंचमी के अवसर पर 12 फरवरी को इसका अपना तन कार्यरूप लेने का निश्चय था मगर ऐसा हो नहीं सका। इसका मुख्य कारण हमारे पास उपलब्ध परिस्थितियां और संसाधन हैं। बिना अनुकूल परिस्थिति और न्यूनतम संसाधन के इसके तन को वृहत जनसमुदाय को सौंपना उचित नहीं है। हमारे पास समाज के सेवार्थ क्या योजनाएं हैं जब तक यह स्पष्ट रूप से अपने पास उपलब्ध नहीं हो तब तक  समुदाय से सहयोग की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।

कोई भी व्यक्ति किसी भी अपरिचित पर विश्वास तभी करता है जब साक्ष्य के लिए ठोस प्रमाण सामने उपलब्ध हों। यह ब्लॉग एक साक्ष्य अवश्य  है मगर इस ब्लॉग की अपनी सीमा है और जब इस सीमा के विस्तार के लिए एक स्वतंत्र तन टॉकिंग व्यूज पर मिल गया है तो जब तक टाकिंग व्यूज पर ड्रीम द्वारका परियोजना का स्वस्थ और पुष्ट तन साकार रूप नहीं लेता तब तक इसकी प्रगति धीमी बनी रहेगी।

इसका तात्पर्य यह नहीं है कि गति इतनी धीमी पड़ जाय कि जीवन को लेकर ही संदेह उत्पन्न हो जाय।

यह परियोजना जीवित है। बेहद धीमी चाल से  चल रही है। मैं इसके जीवित होने की पुष्टि कर रहा हूं। यह तेज गति से चले और सरपट दौड़ते हुए लोगों की सेवा कर सके इसके लिए ठोस कदम धीमे-धीमे ही सही उठाए जा रहे हैं। अब कोई तिथि निर्धारित करने से पहले इसके पुष्ट तन के लिए काम हो रहा है।

यह काम 31 मार्च से पहले पूरा हो और नए वित्त वर्ष के साथ यह अपने तन के साथ आकार ले इसके प्रयास जारी हैं।

ईश्वर कृपा करें कि नए वित्त वर्ष 01 अप्रैल 16 से पहले यह साकार होकर सामने आ जाय।


सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

अटल इरादा : सधे कदम और धीमी चाल से दूर तक जाने का हौसला, अपने समय की चुनौतियों का हल पाने का भरोसा

चाल धीमी तो है मगर कदम सधे हुए हैं। संसाधन न्यूनतम हैं पर हौसले बुलंद है। आने वाला समय परिवर्तन का साक्षी होगा इसमें कोई संदेह नहीं है।

पिछले पोस्ट में तय किया था कि एक सप्ताह के भीतर ड्रीम द्वारका का तन तय कर लूंगा और क्या स्वरूप अंततः होगा इसे तय कर ही आगे बढूंगा। नीयत समय पर ऐसा हो गया। इसलिए पूरा संतोष है।

ड्रीम द्वारका एक ब्लॉग के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखेगा जहां इसके विचार मुक्त रूप में रखे जाएंगे। 


तन के रूप में पिछले सप्ताह इसे अपना दूसरा घऱ www.talkingviews.com पर मिल गया है। यह घर फिलहाल किले के रूप में नहीं बल्कि आश्रय स्थल के रूप में कार्यरत होगा । कालक्रम में यह मजबूत किला बनेगा।  दूर दूर से चल कर यहां तक इसके निवासी पहुंचेंगे। इसके आश्रय में लोगों को एक नया जीवन मिलेगा।


नया जीवन जो तन को पूर्ण स्वस्थ, मन को प्रतिपल प्रसन्न और जीवन को आनंदमय रखेगा।

टॉकिंगव्यूज के स्वत्वाधिकारी ऐसे व्यक्ति मिले हैं जिन पर विश्वास किया जा सकता है। दरअसल व्यक्ति का चरित्र एक दो दिनों में नहीं बनता और ना ही मौसम की तरह रंग बदलता है। ये ऐसे चरित्रवान हैं जिन्हें साथ लेकर दूर तक , देर तक चला जा सकता है।

उनका चरित्र स्थिर है, ऐसा अभी दिख रहा है। ईश्वर उन्हें और उनके चरित्र को स्थिर बनाए रखे यह कामना है।

स्थिर प्रवृत्ति के लोग ही प्रारब्ध को चुनौती दे पाते हैं । विवश होकर सिरजनहार को उन्हें अवसर देना पड़ता है। 

हम किस प्रारब्ध को लेकर आए हैं यह नहीं जानते पर अपना जीवन लक्ष्य जान सकें और इस पर स्थिर रह सकें तो जीवनकाल में युगसत्य बन जाते हैं। मैं युगसत्य नहीं बनना चाहता लेकिन अपने लक्ष्य को जानता हूं। जिस सोच पर बचपन से चला हूं , अब तक टिका हूं और शेष बचे समय में भी टिका रहूंगा।

मैं यह मानता हूं कि मुझे अपने जीवन का लक्ष्य पता है। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मेरे पास जो संसाधन उपलब्ध हैं उनसे अपने लक्ष्यों को अवश्य प्राप्त करूंगा।

इस तन की रक्षा के लिए आवश्यक सामग्रियां जुटाना उसका काम है जिसने मुझे इन विचारों के साथ धरती पर भेजा है । इस तन के साथ जुड़े अन्य परिजनों, पुरजनों का साथ बनाए रखना भी उसीकी जिम्मेदारी है। इस लक्ष्य के लिए संसाधनों का इंतजाम भी उसी को करना है। मुझे तो बस परिणाम की अपेक्षा किए उन रास्तों पर लगातार चलते रहना जिनसे लक्ष्य की पूर्ति होगी।

मैं उसके दिखाए लक्ष्य की ओऱ ही बढ़ रहा हूं।

ड्रीम द्वारका का जन्म अक्षय नवमी तिथि को वर्ष 2015 में होना इसीका अंग है। अब इसका अगला चरण अपने नवजात तन के रूप में www.talkingviews.com पर 12 फरवरी 2016 को श्री पंचमी यानि सरस्वती पूजा के अवसर पर प्रकट होगा। 

मां भगवती इसे पूर्णता देंगी।  

अब इस पोस्ट और इन विचारों को पूर्णता देता हूं।

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

ड्रीम द्वारका अभियान की धीमी प्रगति पर एक तटस्थ आकलन

आज शुक्रवार है। 29 जनवरी 2016 को यानि आज इस अभियान के आरंभ के लगभग तीन महीनों का एक तटस्थ आकलन आवश्यक लग रहा है।

कार्तिक शुक्ल नवमी यानि 20 नवंबर 2015 को अक्षय नवमी तिथि को यह ब्लॉग आरंभ हुआ है। इस तिथि से पहले भी ड्रीम द्वारका को लेकर चर्चाएं कुछ मित्रों के साथ हुई थी और स्वतः प्रेरणा से एकल प्रयास के तहत 20 नवंबर को अंततः इसका जन्म हुआ है।

हर महीने दो पोस्ट प्रकाशित हो रहे हैं। यह अभीतक केवल मेरे द्वारा लिखा, देखा और समय समय पर पढ़ा जा रहा है। इसका प्रचार प्रसार भी मैंने कुछ खास नहीं किया है। केवल दो मित्र जो संभवतः इस परियोजना के भागीदार बन सकें उनके साथ इस पर चर्चा हुई है। दोनों मित्रों ने अपना यथासंभव सहयोग देने का भरोसा भी दिया है। लेकिन इन दोनों ने भी अभी तक यह ब्लाग खोल कर खुद देखा है ऐसा नहीं लगता।

हालांकि इस परियोजना को प्रचारित प्रसारित करने के लिए मैं व्यक्तिगत स्तर पर अपने पास उपलब्ध अधिकतम समय दे रहा हूं। मेरे जानकार जितने व्यक्ति हैं उनके साथ इस पर लगातार चर्चाएं कर रहा हूं।

यह ब्लॉग शुरु होने के तुरंत बाद अपने एक मित्र के साथ कई दौर की चर्चाएं हो चुकी हैं जिनका उद्देश्य ड्रीम द्वारका को एक तन इंटरनेट पर उपलब्ध करना है। मुझे लगता है कि मेरे विचारों के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित एक वेबसाइट या किसी अन्य वेबसाइट के सहयोग से ऐसा स्थान वेब पर उपलब्ध होना चाहिए जहां पर सारे तथ्य रखे जा सकें और इनसे लाभ उठाने के लिए हर वह व्यक्ति स्वतंत्र हो जो इसे देखना चाहे, पढ़ना चाहे और इसके माध्यम से लाभ उठाना चाहे।

सोशल मीडिया पर ऐसी कई वेबसाइट हैं जो थोड़ी बहुत सीमाओँ के साथ यह सुविधा दे सकती हैं लेकिन मैं इनका उपयोग करूं यह अभी तय नहीं कर पाया हूं। लेकिन मुझे लगता है कि जितना जल्दी यह फैसला कर लूं उतना बेहतर होगा क्योंकि काल का चक्र कभी थमता नहीं और हर पल समय शेष होता जा रहा है यह मैं अच्छी तरह जानता हूं।

ऐसे में अगला सप्ताह निर्णायक होना चाहिए।

बीते सप्ताह , 21 जनवरी से 27 जनवरी तक हमने एक अभियान चलाया । इस अभियान के तहत भारत गणतंत्र उत्सव India Republic Week पूरे सप्ताह मनाने का न्यौता लोगों को दिया गया। उनसे आग्रह किया गया कि आप देशभक्तिपूर्ण लेख लिखें, विचार व्यक्त करें, दोहे लिखें, कविताएं लिखें और ईमेल आइ डी-dreamdwarkapsmt@gmail.com पर भेज दें। लोगों में उत्साह जगे इसके लिए इनाम की व्यवस्था भी रखी गई। वॉट्सएप समूह  An Initiative Group और अंग्रेजी हिन्दी समाचार पोर्टल क्रमशः  www.facenfacts.com और www.jantajanardan.com पर इस संबंधी पोस्टर खबरें भी डालीं गयीं।

लेकिन किसी भी व्यक्ति का कोई मेल इस संबंध में पूरे सप्ताह नहीं प्राप्त हुआ।

किसी के द्वारा कोई मेल नहीं भेजना क्या दर्शाता है ?


  1. प्रचार प्रसार में कमी रही  
  2. योजनाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया नहीं गया
  3. देशभक्ति के प्रति लोगों में अभिरुचि नहीं है
  4. ड्रीम द्वारका के प्रति लोगों में विश्वास नहीं है
  5. इनाम का प्रस्ताव आकर्षक नहीं है
  6. अन्य कोई कारण 
जो भी व्यक्ति, जब कभी इस ब्लाग को पढ़ें वह इस पर अपने सुझाव ईमेल आइ डी dreamdwarkapsmt@gmail.com पर भेज सकते हैं।


वॉट्स एप ग्रूप एआईजी का प्रसार लगभग एक सौ व्यक्तियों में है। इसके अलावा दो तीन और वाट्स एप समूह जिसके सदस्यों की संख्या तीन सौ से अधिक होगी में यह संदेश एक बार 21 जनवरी 2016 को भेजा गया था। इक्कीस जनवरी के बाद यह संदेश दोबारा नहीं प्रसारित किया गया। यानि लगभग पांच सौ व्यक्ति तक यह संदेश कम से कम एक बार तो भेजा गया लेकिन इसके बाद आक्रामक तरीके से इसे बार-बार दोहराया नहीं गया।

संदेश बार- बार नहीं दोहराने के कई कारण हैं । इनमें से सबसे प्रमुख ड्रीम द्वारका का अपना तन  नहीं होना है। इसके तन के बारे में अगले सप्ताह तक हर हाल में सुनिश्चित फैसला कर लेना है।

अभी का बस यही संकल्प

ड्रीम द्वारका अपने उद्देश्यों को प्राप्त करे इसके लिए और अधिक स्पष्टता के साथ ठोस कदम उठाने हैं।  

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

मकर संक्रान्ति के अवसर पर 15 जनवरी 2016 को ड्रीम द्वारका परियोजना का लोकार्पण

नई दिल्लीः 15 जनवरी 2016

ड्रीम द्वारका परियोजना आज विधिवत आम जन के सेवार्थ समर्पित है। यह परियोजना जीवनशैली में सुधार के साथ हम में से हर किसी की समस्याओं के समाधान में यथासंभव सहयोग उपलब्ध कराने के लिए आरंभ हो रही है। 

हम यह मानते हैं कि हम मानवों की अधिकांश समस्याएं हमने खुद पैदा की हैं और इनके समाधान के लिए हमें अपने जीवन में सार्थक परिवर्तन के लिए आगे आना चाहिए।

पेशे से एक रेडियो -टेलीविजन पत्रकार और अभिरुचि से धर्म के विज्ञान का शोधार्थी होने के नाते मैंने जो भी ज्ञान अर्जित किया है वह ज्ञान सबजन हिताय सबजन सुखाय समर्पित है। 

आज प्रातःस्नान के साथ मैंने संकल्प लिया है कि मैं अब से अपना संपूर्ण जीवन मां भगवती के भ्रामरी रूप के उद्भव और संरक्षण के लिए बिताउंगा।

मैं यह मानता हूं कि आज दुनिया भर में अज्ञानवश कीटों के विरुद्ध एक विनाशकारी अभियान चल रहा है जिसके परिणाम अन्ततः मानवों को ही भुगतने पड़ रहे हैं। 

जिस तरह एक वन प्रदेश में सभी जीव जंतुओं के सिरमौर के रूप में सिंह या बाघ का होना पारिस्थितिक तंत्र की संपूर्णता का परिचायक होता है ठीक उसी तरह एक आत्म निर्भर मानव नियंत्रित गांव और नगर तंत्र में  कीट समाज के सिरमौर भ्रमर का होना अनिवार्य  संकेतक है। 

मगर दुर्भाग्यवश कहीं से भंवरों को बचाने का अभियान कहीं नहीं दिख रहा क्योंकि उसकी आवश्यकता और उपयोगिता को गंभीरता से नहीं देखा जा रहा है। 

मानव की खाद्य आवश्यकताओं के लिए कीट समाज की स्वस्थ और सम्यक उपस्थिति अनिवार्य है पर कीटों के विविध वंश को कीटनाशकों द्वारा नष्ट किया जा रहा है। 

ड्रीम द्वारका अभियान के अंतर्गत गांव और महानगर की हर छत पर ऑरगेनिक फॉर्मिंग को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।  हर छत चाहे वह छोटा हो या बड़ा इसके कुल क्षेत्र के एक तिहाई हिस्से में मौसमी फूल औऱ , एक तिहाई हिस्से में मौसमी सब्जी उगाने का लक्ष्य रखा जाएगा। बाकी बचे एक तिहाई हिस्सा का आधा छत के उपयोगकर्ता  परिवार के लोगों के बैठने के लिए तथा आधा हिस्सा स्थायी महत्व के झाड़ीदार वनस्पतियों के लिए आरक्षित  होगा।

यहां उगायी जा रही वनस्पतियों पर किसी भी तरह के कीटनाशक का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। इनमें रासायनिक खाद नहीं डाले जाएंगे।

इसके लिए हम एक व्यापक जनजागृति अभियान चला रहे हैं। 

इस अभियान में हमें आपका सहयोग चाहिए। 

यदि आप प्रोफैशनल हैं और अपना समय समाज के लिए दान कर सकते हैं तो अपनी विशेषज्ञता का लाभ हमारे आम उपभोक्ताओं को दीजिए। हम देश की राजधानी दिल्ली में द्वारका सब सिटी की सोसाइटीज में अपना जनजागरण अभियान चलाएंगे। 

इन अभियानों में अपने कौशल से आप उनको सलाह सेवा दे सकते हैं। यदि आपके पास बेचने के लिए कोई उत्पाद है तो आप अपने उत्पाद के सैंपल के साथ इस अभियान में भाग लेकर अपने उत्पाद बेच सकते हैं।   

पेशे से एक रेडियो टेलीविजन पत्रकार होने के नाते मैं किसी भी व्यक्ति -छात्र-छात्रा को रेडियो और टेलीविजन में एनाउन्सर, रेडिय़ो जाकी, न्यूजरीडर, प्रजेन्टर और कार्यक्रम निर्माण की हर जानकारी निःशुल्क उपलब्ध कराने का वचन देता हूँ। 

यदि कोई भी व्यक्ति वाक कला यानि बोलने की कला सीखना चाहता है तो उसकी मदद के लिए एक प्रोफैशनल तरीके से तैयार कोर्स उपलब्ध है जिसका संचालन हमारे अभियान के लिए होगा। 

इसके अलावा हम प्रिन्ट मीडियम या तेज गति से उभर रहे इंटरनेट यानि वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने के इच्छुक प्रशिक्षुओं की हरसंभव मदद के लिए तैयार हैं। 

प्रशिक्षण के  लिए फिलहाल हमारे दो केन्द्र कार्यरत हैं। इनमें से एक जनकपुरी तथा दूसरा द्वारका में है। 

हम जल्दी ही धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी आत्मिक उत्थान के लिए प्रशिक्षण शिविर शुरु करने जा रहे हैं जहां आकर कोई भी व्यक्ति अपने तन को स्वस्थ बनाने के उपाय और मन को प्रसन्न रखने की कला सीख सकेगा। 

हर आयुवर्ग के लोग इस अभियान में संग चलने के लिए आमंत्रित है।