शनिवार, 27 अगस्त 2016

तन को स्वस्थ, मन को आनंदित बनाए पंचकोश का ज्ञान


मुस्कान मेल पैगाम

पहले मुस्कुराइए फिर नज़रें आगे दौड़ाइए।

ये नहीं चलेगा कि आप अपनी मोहिनी सूरत को रोनी बनाकर मुस्कान मेल देखने चले आइये।
बिल्कुल नहीं चलेगा।

आपको पता हो या नहीं मैं जानता हूँ कि आप और केवल आप दुनिया में सबसे सुंदर हैं।

अपने नाजुक सुंदर होठों पर मुस्कान लाइए ना
ये देखिए
आ गयी
पतली सी मुस्कुराहट....................

बिल्कुल छुरी वाली मुस्कुराहट

देखिए, सर्जिकल ब्लेड वाली आपकी इस मुस्कान से किसी की मौत हो सकती है ।

इसलिए ये वाली नहीं

चीज़ वाली मुस्कान लाइए.....................

ये हुई ना बात।

जब चीज़ वाली चौड़ी मुस्कान

चेहरे पर आती है ना........

तो

होंठ, पतले हों या मोटे,

गोरे हों या काले,

लिपस्टिक लगे हों या चिपस्टिक,

आप बहुत खूबसूरत दिखते हैं.........

सच्ची.......

बिल्कुल सच्ची.......

क्या कहा ? .......

 चलिए , मेरा भरोसा मत कीजिए। आइने में अभी देख लीजिए।

वैसे यदि आइना नहीं हो तो कोई बात नहीं, जो कोई नजदीक है, उसकी 

आंखों में झांक कर अपने प्यारे से चेहरे को देखिए।

अब हुआ भरोसा।

है ना दुनिया का सबसे खूबसूरत चेहरा आपका।  

कोई पास नहीं है ? कोई बात नहीं

मैं हूं ना

अपने इस लेख के माध्यम से.........

अपनी आवाज के माध्यम से........................

मैं यह घोषित करता हूं कि

आप दुनिया में सबसे ज्यादा खूबरसूरत  हैं ।

देखिए जिस दिन अपने मन में यह विश्वास आ जाता है कि हम दुनिया में 

सबसे सुन्दर हैं, सबसे योग्य हैं और हम अपनी ज़िन्दगी अपने फैसलों के 

अनुसार चलाएंगे उस दिन से हमारे अन्दर एक बुनियादी बदलाव आना शुरु हो जाता है।
   
  जिस दिन हम अपनी खुशी के लिए दूसरों के दिए  सर्टिफिकेट की 

परवाह किए बिना अपने फैसले पर यकीन करने लगते हैं उस पल से 

हमारे तन और मन में आनन्द का एक नया दरवाजा खुलना शुरु होता है।

लेकिन यह दरवाज़ा है कहां ...

कैसे खुले यह दरवाज़ा.........

ये सच है कि इस दरवाजे को ढूंढना और खोलना आसान नहीं है।

लेकिन ये भी सच है कि यह दरवाज़ा कहीं बाहर नहीं है

इसे ढूंढने के लिए

पाने के लिए

खोलने के लिए

हमें ही कोशिश करनी पड़ती है। हमारे अलावा कोई दूसरा हमारी कोशिश नहीं कर सकता। हां 
सहायता जरूर कर सकता है।

आप ये कोशिश कर सकें..

इसीलिए तो मुस्कान मेल आपके पास रोज पहुंच रहा है

कि

आप अपने को जानिए

अपने तन मन की बनावट को जानिए।

अपना दरवाज़ा ढूंढ निकालिए और अपनी चाहत को पूरी कर डालिए।

कोशिश शुरु तो कीजिए।

कोशिश के शुरु करने के लिए ज़िन्दगी में इस पल से बेहतर और कोई पल नहीं होता। बस अभी से शुरु हो जाइए।

लेकिन पहले मुस्कुराइए क्योंकि ये रास्ता मुस्कान हाइवे पर आगे बढ़ता है।
         

क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच तत्व यह अधम शरीरा के माध्यम से मुस्कान मेल यही तो कर 

रहा है। जानकी जयंती यानि 15 अप्रैल 2016 से शुरु होकर लगभग सौ दिनों से लगातार प्रातःकाल 

आप तक पहुंचना और आपको भरोसा दिलाना, आपसे मुस्कराने की अपील करना और क्या है

बस यही भरोसा दिलाना ना कि आप दुनिया में सबसे सुंदर हैं। आप कोशिश कर सकते हैं  ।

 आप स्त्री हों या पुरुष

युवा या बुजुर्ग

मेरे लिए आप इस धरती पर सबसे खूबसूरत जीव हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मैं आप से प्यार करता 

हूं 

और आप मुझसे। क्यों भरोसा नहीं हुआ .............

देखिए आप मेरी आवाज सुनते हैं ना। अभी इस पल आपकी बेपनाह सुंदर आंखे इन शब्दों को पढ़ 

रही हैं ना.....

क्यों भला.......

यही प्यार है। यही स्नेह है। यही चाहत है । यही एक दूसरे के लिए सम्मान है।

और यह प्यार,

यह स्नेह

यह एक दूसरे के लिए चाहत

कुछ पाने के लिए नहीं हैं।

बस देना है।

और देना भी क्या

एक मुस्कुराहट

बस इतनी सी बात।  

हम ऐसी जानकारियां एक दूसरे को दें जिससे हमारा तन और मन दोनों स्वस्थ रहे, प्रसन्न रहे।  

तन स्वस्थ रहेगा तो मन प्रसन्न रहेगा। तन स्वस्थ और मन प्रसन्न रहेगा तो मुस्कुराएगा ही।

मुस्कान मेल का जन्म मुस्कान बांटने के लिए हुआ है। एक दूसरे से बिना किसी अपेक्षा के स्नेह 

देने के लिए हुआ है।

जब हम बिना किसी अपेक्षा के अपने पास उपलब्ध कोई भी जानकारी या सामान दूसरे को

ईमानदारी के साथ बांटते है ना

देते हैं ना

तो

इस बांटने से

देने से

पाने वाले को भी लाभ होता है

और

देने वाले को भी लाभ होता है।

यही लोक कल्याण है।

यही शिव संकल्प है।

यही सत्यम शिवम सुन्दरम है।

ये मत सोचिए कि जो दे रहा है

उसे लाभ नहीं होता है। देने वाले को भी बहुत लाभ होता है।

क्या लाभ होता है जिस पल देना शुरु कीजिएगा उस पल से समझना शुरु होगा।

बस ये याद रखिए कि ऐसी वस्तु , ऐसा धन या ऐसा ज्ञान दूसरे को मत दीजिए जो आपका अपना 

नहीं है।

मन , कर्म और वचन से जो कुछ आपका अपना है वही आप दूसरे को दे सकते हैं। जो किसी दूसरे 

का है वो आप नहीं दे सकते।

अपना कमाया हुआ धन

अपने तन और मन पर किये प्रयोग का परिणाम

ही आप दूसरों को दे सकते हैं।  

फारवर्डेड मैसेज या किताबों में पढ़ी बातें यदि आपके अपने जीवन में शामिल नहीं हैं तो आपकी 

कही बातों का कोई असर नहीं होगा।

कुछ पल या कुछ दिनों तक ऐसा हुआ भी तो इसका लाभकारी परिणाम टिकेगा नहीं। इसका 

नुकसान आज नहीं तो कल आपको ही भुगतना पड़ेगा।

स्माइल मेल के माध्यम से यही संकल्प लिया गया है कि जो भी जानकारी मुझे अपने स्वाध्याय 

से, तप से और लगातार दशकों के अभ्यास और प्रयोग से मिली है उसे बिना किसी अपेक्षा के दूसरों 

के साथ शेयर करूंगा। 

बाटूंगा।

भारत वर्ष में युग-युग से ऐसा होता आया है। अभी भी मुस्कान मेल यही कर रहा है।

मुसकान मेल के माध्यम से जो भी जानकारी बांटी जाती है वह पूरी जिम्मेदारी के साथ बांटी जाती 

है। हर रोज सुबह आप जो कुछ सुनते हैं वह मेरा अपना सत्य होता है। मैं आपको कोई गलत 

जानकारी जानबूझ कर नहीं दे सकता।

जब आप मेरे संपर्क में होते हैं तो आपको किस रूप में अगला कदम उठाना है , उसका क्या लाभ 

हो सकता है, नुकसान हो सकता है, यह बिल्कुल साफ साफ बताता हूं। ऐसा इसलिए कि जो मेरा 

अनुभव है वह आपका भी अनुभव हो सकता है।

देखिए मेरे तन मन पर जो घटित हुआ है उससे मिलता जुलता आपका भी अनुभव हो सकता है। 

एक मानव और दूसरे मानव में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं होता। कुछ-कुछ थोड़ा सा मिलता जुलता 

है और कुछ-कुछ थोड़ा सा अलग होता है। लेकिन हर मानव कुल मिलाकर मानव ही तो होता है ना।

ऐसा ही है ना .....

   इसी बात पर हो जाए एक मुसकान...

आइए अब हम अपने तन मन की बनावट को कोश यानि सूक्ष्म सेल के स्तर पर समझने का 

प्रयास करें। इसे जानकर हम अपने आप को बेहतर तरीके से जान सकेंगे।

यदि तन में

या

मन में

कहीं कोई पीड़ा है

कसक है

तो

उसका बेहतर समाधान कर सकेंगे।

सनातन भारतीय परंपरा और योग शास्त्र की किताबों में जो कुछ संस्कृत सूत्रों के माध्यम से कहा 

गया है उसे पढ़िएगा तो संस्कृत भाषा की जानकारी चाहिए। सूत्र अपने आप में पूर्ण हैं। थोड़े 

अभ्यास से इन्हें पढ़ कर समझा जा सकता है।

लेकिन इन्हें ठीक ठीक जानने के लिए इन ग्रंथों के प्रति, ग्रंथ लिखने वाले के प्रति और ग्रंथ में 

कही जा रही बातों के प्रति

आपके मन में

श्रद्धा होनी चाहिए

आस्था होनी चाहिए

विश्वास होना चाहिए

कि

इनमें जो कहा जा रहा है

वह सत्य है

मेरे लिए लाभकारी है

मैं इस पर भरोसा

करता हूं

करती हूं।

मन में श्रद्धा-आस्था और विश्वास नहीं है तो वह ग्रंथ आपके लिए उचित नहीं है । इससे आपको लाभ नहीं होगा।  

लेकिन आप संस्कृत नहीं जानते हैं और इसकी हिंदी या अंग्रेजी व्याख्या पढ़ कर समझना चाहते हैं 

तो उलझने के आसार अधिक हैं। ऐसा इसलिए कि व्याख्या करने वालों ने इसे बुरी तरह उलझा 

दिया है। व्याख्या करने वाले विद्वानों के अलग - अलग मत हैं। हर मत के समर्थक और विरोधी हैं। 

ये विद्वान हैं। इनका उद्देश्य अपने मत के अलावा दूसरे के मत को बकवास साबित करना है ताकि 

अपने मत के प्रचार प्रसार से अपना भला हो। अपना रोज़गार बढ़े।

इसलिए इन विद्वानों की व्याख्या पढ़कर आपके उलझने का खतरा अधिक है। किसे सच मानें किसी 

झूठ मानें इससे बचना है तो जो कुछ जहां कहा जा रहा है उसे अपनी बुद्धि से परखिए।

आपकी बुद्धि में जितनी बात समझ में आए उसे अपने तन और मन के साथ जोड़ कर देखिए। यदि 

आपके तन और मन की कसौटी पर वह बात सच है तभी उसे सच मानिए नहीं तो झूठ कहिए। 

यही फार्मूला आप किसी भी किताब के साथ किसी भी गुरु पर आजमा सकते हैं। किसी के लिखे या 

कहे जा रहे तथ्यों पर आजमा सकते हैं।

जितनी बात आपकी समझ में आए बस उतना ही सत्य आपके लिए है बाकी असत्य है और उन 

बातों का कोई लाभ नहीं है।

हमारे आपके तन और मन के पांच कोश माने गए हैं। ये पांच कोश पूरे जगत और ब्रह्मांड की 

बनावट को समझने के लिए भी उपयोग किए जाते हैं। लेकिन हमें अभी जगत और ब्रह्मांड को छोड़ 

कर केवल अपने तन मन के स्तर पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

ये पांच कोश इस प्रकार हैं।
1.   

   अन्नमय कोश
2.   
    प्राणमय कोश
3.     
   मनोमय कोश
4.   
   विज्ञानमय कोश
5.   
   आनन्दमय कोश

अन्नमय कोशः देखिए जब धरती पर जीवन की शुरुआत हुई तो उससे पहले पांचो तत्व धरती जल अग्नि वायु और आकाश की व्यवस्था हुई। जल से जीवन का सृजन शुरु हुआ। सबसे पहले बहुत सूक्ष्म जीव आए जो जीव और अजीव के बीच की स्थिति में आए। इन सूक्ष्म जीव से वनस्पतियां यानि पौधे आए । पौधों के बाद पशु रूप में प्राणी आए।

हम मानव पशु रूपी प्राणी के ही उन्नत रूप हैं। हमारा जीवन वनस्पतियों की कृपा पर आधारित है। यह ठीक है कि मांसाहारी मानव, पशु या पक्षी या अन्य जीव मांस खाते हैं लेकिन उनका आहार भी वनस्पति खाकर अपना जीवन चलाने वाले दूसरे जीव पर आधारित है।

इस प्रकार हम सब जीवों का जीवन वनस्पति पर आधारित है। ये वनस्पतियां अपनी रक्षा के लिए जीवों पर आधारित हैं। इस तरह परस्पर एक दूसरे की रक्षा करके जीवन चक्र चलता रहता है।

इस वनस्पति को

या

अपने आहार को

भोजन को

हम अन्न मान लें तो

अन्न से निर्मित जो हमारा तन है वह अन्नमय कोश कहलाता है।

यही अन्नमय कोश सूक्ष्म जीवों का भी है। सबसे छोटा जीव वायरस और बैक्टीरिया को लें तो उनका भी प्रथम कोश अन्नमय कोश है। यानि जीवन जिस किसी में है उसका पहला कोश जो सबसे स्थूल है , देखने में नजर आता है वह अन्नमय कोश है।

अन्नमय कोश की रक्षा आहार लेकर ही हो सकती है। हम आप जो भी हों यदि जीवित रहना है तो हमें आहार लेना ही होगा। इस आहार में भी वही पांच तत्व क्षिति जल पावक गगन समीरा शामिल हैं। हम मानव यह आहार वनस्पति के रूप में मुख्य रूप से लेते हैं।

हमारे शरीर का जो भी हिस्सा दिखायी देता है या समझ में आता है वह इसी अन्नमय कोश का प्रभाव है। इस कोश की रक्षा उचित आहार लेकर की जाती है।

यानि इसका सीधा सा मतलब हुआ कि हमें स्वस्थ तन चाहिए तो अपने अन्नमय कोश को जानकर अपनी आयु के अनुकूल उचित आहार अवश्य लेना चाहिए।

इतनी बातें हो गयीं और अब तक हम मुस्कुराए नहीं। इतनी सीरियस चर्चा बिना मुस्कान के नहीं होनी चाहिए। चलिए हो जाए एक मुस्कान इसी बात पर।  

प्राणमय कोशः अन्नमय कोश जितना स्थूल है उससे सूक्ष्म है प्राणमय कोश। प्राण देखने में तो नहीं आता लेकिन इसका अनुभव हम अच्छे से कर पाते हैं। प्राण हमारे तन के हर अंग के हर हिस्से में है। जब तक तन में प्राण है तभी तक जीवन है। जिस पल प्राण तन से निकल जाए उस पल से तन वापस अपने मूल पांच तत्व क्षिति जल पावक गगन समीरा को वापस लौटने लगता है।

यह प्राण हर जीव को चाहिए। जीवन के सूक्ष्तम रूप से सबसे अधिक उन्नत रूप हर किसी को प्राण चाहिए। हम मानव यह प्राण वायु के माध्यम से अपने तन के अंदर लेते हैं और विभिन्न रूपों में इसके उपयोग के बाद अपने तन से बाहर निकाल देते हैं।

इस प्राणमय कोश का अनुभव तन के अंदर वायु की गति से किया जा सकता है। यदि प्राणायम के लिए हम नियमित समय निकालें और अपने अंदर वायु के आगमन और प्रस्थान पर ध्यान दें तो बस एक प्राणायम का अभ्यास हमें पूरी तरह नीरोग रखने में सक्षम है।

प्राणायाम की विभिन्न विधियां हैं। इन्हें हमें सीखना चाहिए और इसका लाभ उठाना चाहिए।   
प्राणमय कोश केवल अपने तन के स्तर पर नहीं कार्यरत है बल्कि यह विश्व और ब्रह्मांड के स्तर पर भी काम करता है।

जब हम अपने तन के साथ प्राण को जोड़ कर प्रयोग करते हैं तो अनेक अनुभूतियां होती हैं। इनमें स्वस्थ तन और प्रसन्न मन के साथ संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यवस्था को देखने समझने की दृष्टि विकसित होती है।

हम इस दृष्टि को विकसित करने का प्रयास जब चाहे तब करें लेकिन भी हमें यहां मुस्कुराना चाहिए।
ज्ञान जहां बोझिल होने लगे उस पड़ाव पर रुक कर मुस्कुराना मुस्कान मेल के नियम हैं। इसलिए हम मुस्कुराएं।
आप भी मुस्कुराइए ना।

देखिए आपने पूजा पाठ होते कहीं देखा है ?
यदि हिंदू समाज से हैं तो हवन होते देखा है ना
हवन में शामिल हर व्यक्ति कुछ- कुछ देर पर स्वाहा बोलता है ना
ठीक इसी तरह मुस्कुराना और अपने साथ होने वाले को मुस्कुराने के लिए आग्रह करना मुस्कान मेल का स्वाहा है।

यदि आप हिंदू समाज से नहीं हैं तो अपनी आस्था के अनुसार जो भी शब्द आपके रिचुअल्स में चलता हो जैसे आमीन ..............

उसकी तरह मुस्कुराइए शब्द जोड़ लीजिए और वाकई मुस्कुराइए।
इससे मुस्कान आपकी ज़िन्दगी में स्थायी आदत बन जाएगी। हर पल आनन्दित रहने की शुरुआत हो जाएगी।

मनोमय कोशः अन्नमय कोश और प्राणमय कोश दोनों से और सूक्ष्म है मनोमय कोश। मनोमय कोश का प्रसार जहां तक हमारा आपका मन जा सकता है वहां तक हो सकता है। यदि हम इसे केवल अपने तन के अंदर देखने और ढूंढने की कोशिश करें तो इसे अपने नरवस सिस्टम यानि तंत्रिका तंत्र से जोड़ कर समझ सकते हैं।

हम सामान्यतः अपने तन के ऊपरी आवरण को देख पाते हैं अंदरूनी अंगों को थोड़ा बहुत समझ पाते हैं। लेकिन जब अन्नमय कोश के साथ प्राणमय कोश को जोड़ कर मनोमय कोश की यात्रा पर चलते हैं तो हम अपने तन की विभिन्न क्रियाओं पर नियंत्रण की ओर आगे बढ़ते हैं।


   आधुनिक विज्ञान यह जानकारी देता है कि हमारे तन की क्रियाएं दो तरह की हैं एक ऐसी क्रिया जिन्हें हम अपनी इच्छा से करते हैं दूसरी ऐसी क्रियाएं जो हमारी इच्छा के बिना भी होते रहती हैं। 

लेकिन जब हम अन्नमय कोश की सहायता से प्राणमय कोश को लेकर मनोमय कोश के दरवाजों तक पहुंचें तो वह हर क्रिया जो अनैच्छिक हैं जैसे हृदय की धड़कन, सांसों का आवागमन इनके नियंत्रण की ओर बढ़ते हैं।    

यहां आप पूछ सकते हैं कि क्या मैंने ऐसा किया है।

नहीं

मैं अभी इस स्तर तक नहीं पहुंच सका हूं।

लेकिन ऐसे लोगों से मिल चुका हूं जिन्होंने इस स्तर को पार किया है और विज्ञानमय कोश की यात्रा पूरी कर आनन्दमय तन की अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं। यहां तक की यात्रा कर सकने वाले लोगों की संख्या धरती पर हमेशा बेहद कम होती है। लेकिन वे होते अवश्य हैं और जो श्रद्धाभाव के साथ उन तक पहुंचते हैं उन्हें श्रद्धालु की योग्यता और पात्रता के अनुसार प्रयोग करके दिखाते भी हैं।

सवाल यह है कि मनोमय कोश को जानना और प्रयोग किसलिए आवश्यक है। जवाब यह है कि यह जानना हर किसी के लिए आवश्यक नहीं है। जिन्हें अपने आप में दिलचस्पी हो, अपने आस पास की समस्याओं के समाधान में दिलचस्पी हो और जिनके मन में लोक कल्याण की भावना हो उन्हें यह जानकारी लेनी चाहिए।

जीव और जगत के अंतर्संबंधों को जानना चाहिए और अपने युग की समस्याओं के समाधान के लिए यथासंभव प्रयास करना चाहिए। यदि आप केवल अपने तन मन की सेहत चाहिए तो अन्नमय कोश और प्राणमय कोश को समझिए और अपने स्थूल शरीर पर काम कीजिए।

बस इतने से आपका तन तन्दुरुस्त रहेगा और आजीवन आप स्वस्थ रहेंगे। आपका हर अंग प्रत्यंग ठीक ठीक काम करेगा और आप पूरी प्रसन्नता से जीवन यापन करेंगे।

यदि आप पर ईश्वर की कृपा हुई तो इससे आगे की यात्रा पर चलने की इच्छा खुद ब खुद होगी और यात्रा पर चलाने वाला भी मिल जाएगा।

बस अभी तो लगे रहिए और मुस्कुराते रहिए।
मुस्कुराए ना आप

कैसी वाली मुस्कान है
छुरी वाली

या

चीज वाली
जो भी है चलेगी

मुस्कुराहट तो मुस्कान है जैसी भी हो दौड़ेगी।  

विज्ञानमय कोशः विज्ञानमय कोश पहले के तीन कोश अन्नमय कोश, प्राणमय कोश और मनोमय कोश से भी सूक्ष्म है। इस विज्ञान मय का अर्थ विशिष्ट ज्ञान मय समझिए। जब अपने तन के अंदर तीन सूक्ष्म कोशों की यात्रा पूर्ण होती है तो विशिष्ट ज्ञान का दरवाजा खुलता है।

सच पूछिए तो इस विशिष्ट ज्ञान का दरवाजा प्राणमय कोश के रास्तों पर चलने से खुलने लगता है। स्थूल से सूक्ष्म का पहला स्तर प्राणमय कोश का प्रयोग ही ऐसे अनेक अनुभव तन के स्तर पर देने लगता है कि हम आप हैरान रह जाते हैं।

उदाहरण स्वरूप रोमांच होना तो समझते हैं ना। यानि अपने तन के रोम का खड़े हो जाना।
जब हमें ठंढ लगती है
जब हम डर जाते हैं
जब हम सिहरने लगते हैं
जब कोई हमें गुदगुदा रहा होता है
जब हम बहुत उत्साह में होते हैं
जब बेहद खुश होते हैं
जब हम बेहद दुखी होते हैं
जब हम आक्रोश में होते हैं
जब हम किसी
मंदिर
मस्जिद
गुरुद्वारे
चर्च
उपासना स्थल में होते हैं
तो पुलकित होकर रोमांच होता है
हमारे तन के रोम खड़े हो जाते हैं

लेकिन यही अनुभूति
आप प्राणायाम के कुछ अभ्यासों से प्राप्त कर सकते हैं

इसे थोड़ा सा विकसित किया जाए तो कोई भी व्यक्ति ना केवल अपने तन के रोम बल्कि सर के घने लंबे बालों को भी सीधा ऊपर खड़े कर ले सकता है।

जरा सोचिए आपने एक लंबी सांस ली या किसी खास विधि से सांस ली और आपके सर के लंबे बाल सीधे ऊपर आसमान की ओर

इसी अभ्यास का अगला स्तर हो सकता है ना केवल बालों को बल्कि अपने पूरे तन को बिना किसी सहारे के आसमान में ऊपर उठा लेना।

यह कोई चमत्कार नहीं है। ना ही हाथ की सफाई है। बस अपने तन के अन्नमय कोश और प्राणमय कोश को साधने की बात है।

 तो जब अन्नमय कोश और प्राणमय कोश के साथ मनोमय कोश की यात्रा विज्ञानमय कोश के दरवाजों से होने लगती है तो अपने तन के अंदर संपूर्ण ब्रह्मांड की यात्रा हो सकती है। विज्ञानमय कोश का प्रयोग समझने और जानकारी रखने वाला व्यक्ति अपने तन के माध्यम से कुछ भी करने में समर्थ होता है।

सरल शब्दों में कहें तो ऐसा व्यक्ति जीवित तन में ईश्वर के समान होता है।

सवाल है क्या ऐसा कोई व्यक्ति आज है। मेरी जानकारी में कम से कम एक व्यक्ति तो हैं जिनसे मैं जानकी जयंती के दिन यहीं दिल्ली में छतरपुर मंदिर में कुछ वर्ष पूर्व मिल चुका हूं। वे सिद्ध पुरुष हैं और उन्हें शिव के समान मैं मानता हूं।

जिस मंत्र शक्ति पर मुझे बचपन से आस्था रही है। जो प्रयोग मैंने जीव और जगत के साथ किए हैं उससे अलग हट कर जो कुछ मेरी नजरों के सामने घटित हुआ उस दिन, वह इस बात का प्रमाण है कि अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश के साथ  मंत्रों के माध्यम से, सूत्रों के माध्यम से शास्त्रों में जो कुछ कहा जाता है वह सत्य है।    

अपने सत्य से बड़ा और कोई तथ्य नहीं होता और जिस तथ्य की साक्षी मेरी अपनी आंखें हैं मेरी अपनी इन्द्रियां हैं उन्हें सत्य मानना और आप तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य है।

इसी बात पर हो जाए मुस्कान।

मुस्कान इस पल आपकी मेरे लिए सबसे बड़ा सत्य है। हमेशा आप मुस्कुराते रहें यही हमारा उद्देश्य है।

आनन्दमय कोश

आनन्दमय कोश को मैं अतिक्रमण की अवस्था मानता हूं। हालांकि इसे उच्चतम अवस्था माना गया 

है। लेकिन मुझे लगता है कि आनन्द छोटी-छोटी अनुभूतियों से प्राप्त हो सकता है।

होता है।

सबसे स्थूल अन्नमय कोश को नहीं जानते हुए भी यदि तन की देखभाल जाने अनजाने होती रहे तो भी आनन्द की अवस्था प्राप्त हो सकती है।

होती है।

इतने से भी हम हर पल मुस्कुरा सकते हैं।

लेकिन जब हम क्रमिक रूप से पांचों कोशों को जानकर हम अपने तन मन की बनावट और इस 

जगत की बनावट और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने लगते हैं तो जानने के लिए और कुछ बचा 

नहीं रह जाता। हर पल  आनन्द की अवस्था इसी संपूर्णता को माना गया है।

जब सब कुछ समझ जाएं तो हर पल मुस्कुराना और आनन्दित रहना सहज हो जाता है।

हम सभी आनन्दमय अवस्था में रहें।

बिना कुछ किए धरे ऐसा हो

 मुस्कान मेल की बस इतनी सी चाहत है।

हो जाए मुस्कान इसी बात पर।

आप मुस्कुराए ना।

इसी तरह जब आप मुस्कुराते हैं ना तो आप बेहद सुंदर लगते हैं।



बाई टेक केयर।  

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

Smile mail message : अपने सुंदर तन और चंचल मन की बनावट पहचानिए


मुस्कान मेल पैगाम

पहले मुस्कुराइए फिर आगे पढ़ने के लिए नजरें  दौड़ाइए

यदि आप जीवन में हर पल मुस्काराना चाहते हैं तो अपने तन मन की बनावट पर गौर फरमाइए। जरा अपने रंग रूप, बनावट, गठन और स्वभाव पर ध्यान दीजिए। अपनी पहचान खुद कीजिए। आयुर्वेद के अनुसार गर्भा वस्था में ही हर व्यक्ति की प्राकृतिक बनावट, उसके रंग रूप और प्रकृति का निर्धारण हो जाता है।

वात, पित्त और कफ आयुर्वेदिक ग्रंथों में त्रिदोष कहे जाते हैं। इन तीनों के सम अवस्था में रहने से शरीर स्वस्थ रहता है। हर व्यक्ति का शरीर आम-तौर पर किसी एक या दो दोषों से प्रभावित होता है। कुछ लोगों में तीन दोषों की समस्या एक साथ हो सकती है। लेकिन यदि व्यक्ति अपनी प्रकृति की पहचान ठीक से कर ले तो प्राकृतिक जीवन शैली अपनाकर अपने दोष का उपचार खुद कर सकता है। यहां दोष का अर्थ गुण से समझना चाहिए। यहां दोष का मतलब किसी बुराई या बीमारी से नहीं है। इन गुणों के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान कर सकता है।

अब सवाल उठता है कि पंच तत्वों के साथ इनका समायोजन कैसे करें। पंच तत्व हैं अग्नि, वायु,जल, पृथ्वी और आकाश। इन पांचों में तीन दोष वात - पित्त और कफ को कैसे पहचानें।

    वात शुद्ध वायु है जिसके गुण अलग अलग तरह के हैं और जिसकी गति 49 तरह की मानी जाती है। वायु की इन 49 गतियों को आप भी अनुभव कर सकते हैं। लेकिन ये एक दिन में कर लीजिएगा। ये मत समझिए। अपने तन के साथ प्रयोग कीजिएगा, नियमित प्राणायम कीजिएगा और समझने की कोशिश कीजिएगा तो पकड़ पाइयेगा। ये विश्वास रखिए।

इसी तरह कफ को सीधा जल से जोड़ने की गलती करने की जरूरत नहीं है। कफ मुख्य रूप से जल है अवश्य लेकिन इसमें बाकी चार तत्व भी मिले हैं। किस रूप में किन तत्वों का अनुपात कैसा है उस पर कफ का निर्माण होता है और यह हमारे शरीर में lubricant यानि स्नेह यानि तेल की भूमिका निभाता है।
 पित्त को भी ठीक इसी तरह सीधे अग्नि मत मानिए लेकिन यह मुख्य रूप से अग्नि प्रभावित अवश्य है।

पंच तत्वों में से तीन तो हो गए बाकी बची पृथ्वी तो यह मुख्य आधार है हमारे तन को जो भी ठोस रूप में दिखता है उसे पृथ्वी समझ लीजिए । लेकिन इसका अर्थ यह मत लगाइए कि उसमें अन्य चार तत्व नहीं हैं। जैसे धरती माता के अंदर खोजें तो और बाहर खोजें तो अन्य चारों का हम अनुभव कर सकते हैं ठीक वैसे ही एक बहुत छोटे आकार वाले जीव या विशालकाय जीव या फिर अजीव पृथ्वी के अंश में अन्य चारों तत्व भी हैं।

अब आइए आकाश को लीजिए । आकाश में ही सब कुछ अवस्थित है। और हमारे शरीर के अंदर भी यही आकाश तत्व हर एक दूसरे अंग को व्यवस्थित करने का जिम्मेदार है। जब हम अपने तन की देखभाल ठीक से नहीं करते या किसी अन्य कारण से हमारे तन मन के अंदर आकाश का संतुलन गड़बड़ होता है तो हमें तरह –तरह की शिकायते होने लगती हैं।   

अब हम पांचो मूल तत्वों और तीन दोषों को थोड़ा सा समझ गए तो आगे बढ़ें। 

लेकिन आगे बढ़ने से पहले मुस्कुराइए। क्योंकि ये स्माइल मेल की आवश्यकता है। बिना मुस्कुराए बढ़िएगा तो समझ नहीं पाइएगा।

मुस्कुराए आप। ये हुई ना बात .....

आयुर्वेद के दो प्रमुख ग्रंथों चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इन्हीं तीन दोषों के आधार पर  व्यक्ति के तन मन की बनावट और प्रकृति पर विचार किया गया है।

इनके आधार पर व्यक्ति की बनावट को  मुख्य रूप से सात तरह का माना गया है। वैसे ये सात ही तरह के नहीं और भी अनेक प्रकार के हो सकते हैं। हमने अपनी सुविधा के लिए इन्हें सात में सीमित किया ताकि आप अपने लक्ष्णों को पहचान कर आसानी से जान सकें कि इन सात में से किस प्रकृति के हैं आप ।

     1.  वातिक प्रकृति     2. पैत्तिक प्रकृति
     3. कफज प्रकृति       4. त्रिदोषज प्रकृति
     5. पित्त वातज प्रकृति  6. वात कफज प्रकृति
7. कफ पैत्तिक प्रकृति

1.      वातिक प्रकृतिः
 वातिक प्रकृति के लोग आम-तौर पर वायु विकार से अधिक ग्रस्त होते हैं। इन्हें ठंड अधिक लगती है और सर्दी बर्दाश्त नहीं होती। शरीर की नसें / शिराएं उभरी हुई होती हैं। हाथ-पैर फटने की शिकायत रहती है। चंचल आंखें, अस्थिर बुद्धि, दुबला-पतला शरीर, तेज चलना, और जल्दी-जल्दी बोलना इनका स्वभाव होता है। नाखून, दाढ़ी और बाल रूखे होते हैं। गाना सुनना और खुद गाना अच्छा लगता है, क्रोध अधिक आता है। क्रोध आने पर बिना सोचे विचारे लड़ाई / हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

यदि आप वातिक प्रकृति के है तो चिंता न करें किसी योग्य आयुर्वैदिक डाक्टर से सलाह करें।  एक सरल उपाय अभी आजमा सकते हैं। अपने अंगूठे और अंगूठे के साथ वाली उंगली यानी तर्जनी के उपरी छोर को एक साथ मिलाकर रखें। यह अपने शरीर में वायु को नियंत्रित रखने का सबसे अच्छा उपाय है। यह ज्ञान मुद्रा कहलाती है

2.   पैत्तिक प्रकृतिः

पैत्तकि प्रकृति के लोग आमतौर पर पित्त की अधिकता से ग्रस्त होते हैं। शरीर से दुर्गंध आना, अधिक पसीने आना, अधिक भोजन करना, गोल-मटोल होना, मुंह की बीमारियों से परेशान रहना (मसलन मुंह में छाले आना, दांत/मसूड़ों में तकलीफ आदि), आंख, जीभ, होंठ, तालू, नाखून, हथेली और तलवा तांबई रंग से यानी तांबे के समान रंग से प्रभावित होना इनके समान्य लक्ष्ण हैं। इन्हें गर्मी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती यह बड़ी जल्दी नाराज़ और खुश हो जाते हैं। यह बड़े तेजस्वी, प्रभावशाली वक्ता और अपनी बात मनवाने वाले लोग होते हैं।

3.   कफज प्रकृतिः

कफज प्रकृति के लोग कफ विकार से अधिक ग्रस्त होते हैं। इनके शरीर में कफ का निर्माण अधिक होता है। जिसपर नियंत्रण रखने की जरूरत होती है। कफ से प्रभावित लोगों का शरीर आम-तौर पर सुंदर सुडौल मध्यम आकार का होता है। यह सामान्यतया नीरोग , कृतज्ञ और सहनशील होते हैं। मगर किसी से दुश्मनी हो जाए तो अंत तक संघर्ष करते हैं।

4.   त्रिदोषज प्रकृतिः

पित्त, वायु और कफ तीनों की अधिकता वाले लोग त्रिदोषज प्रकृति वाले कहे जाते हैं। इन्हें अपना ध्यान अधिक रखने की आवश्यकता होती है।

5.   पित्त वातज प्रकृतिः

वात और पित्त की अधिकता वाले लोग इस श्रेणी में आते हैं।

6.   वात कफज प्रकृतिः

कफ और वात की अधिकता वाले लोग इस श्रेणी में आते हैं।

7.   कफ पैत्तिक प्रकृतिः

जब कफ और पित्त दोनों की अधिकता हो तो ऐसे व्यक्ति इस श्रेणी में रखे जाते है।

    जिस तरह व्यक्ति की प्रकृति होती है उसी तरह हर अन्य जीव और जीवित पद्धार्थ की भी प्रकृति होती है हम आहार रूप में जिस फल, सब्जी या अनाज का उपयोग करते हैं इनकी भी अपनी प्रकृति होती है। आयुर्वेद में आहार की प्रकृति का भी निर्धारण किया जाता है। और प्रकृति के अनुसार आहार चिकित्सा और वनस्पतियों के माध्यम से इलाज करने की परंपरा है।

     मान ले  यदि हम में से  कोई व्यक्ति कफज प्रकृति का है यानी कफ से प्रभावित है तो ऐसे में उसके आहार में कफ बढा़ने वाले खाद्य पद्धार्थ मसलन अरबी, भिंडी, राजमा, दही की मात्रा बढा़ दी जाए या वह जाने-अनजाने इनका सेवन अधिक करे तो उसकी कफ की समस्या बढ़ती चली जाएगी जबकि यही आहार पित्तज प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए नुकसान देह नहीं होगा।

मैं कफज प्रकृति का हूं यदि तीन शाम भोजन में दही का इस्तेमाल लगातार कर लूं तो शरीर की जो दशा हो सकती है वह मेरे संपर्क में रहने वाले ही जानते हैं। इसलिए दही को लेकर बेहद सावधान रहता हूं मगर कभी मित्रों के स्नेह पर या और कोई विकल्प नहीं रहने पर दही सेवन अधिक हो गया तो उसके दुष्परिणाम के निवारण के लिए यथासंभव उपाय करने पड़ते हैं।  

 आपको भी अपने आहार को लेकर सतर्क रहना चाहिए। अपने बनावट को जानना चाहिए। अपनी प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली अपना कर हर पल आनन्दित रहना चाहिए।

क्यों क्या ख्याल है ?
अपना ख्याल रखिए , मुस्कुराते रहिए।




सोमवार, 15 अगस्त 2016

10 अगस्त 2016 - सावन शुक्ल सप्तमीः अतिथि देवो भव, आंवला प्रसंगः सैलई धामः गोस्वामी तुलसी दासजी की जयंती पर दिल्ली से कलुपुरा और सूकर क्षेत्र की यात्राः


रामजी की लीला अद्भुत है। इसे समझना और इसकी व्याख्या कर पाना भी बेहद कठिन है। हम रामजी की 

लीला के आज के विचार बिन्दुओं तक पहुंचें उससे पहले आज की तिथि और प्रसंग को समझ लें।

आज सावन शुक्ल द्वादशी तिथि है तदनुसार 15 अगस्त 2016। भारत वर्ष की राजनीतिक आजादी का ऐतिहासिक दिन।

आज हम एकादशी संकल्प शृंख्ला की तीसरी कड़ी पर अपने विचार यहां रख रहे हैं। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले दो अन्य पोस्ट पढ़ लें तो पूरा प्रसंग स्पष्ट हो जाएगा। इन दोनों के लिंक इस प्रकार हैं।

http://dreamdwarka.blogspot.in/2016/08/1-aig.html

http://dreamdwarka.blogspot.in/2016/08/2-aig.html

श्री रामवीर सिंह जी भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं। सेवा काल में पूरे देश का भ्रमण करने के बाद अब अवकाश प्राप्त जीवन बिता रहे हैं। रामजी के भक्त हैं। रामायणजी के मर्मज्ञ हैं और श्री रामचरित मानस तथा गोस्वामी तुलसी दास के प्रति श्रद्धावान हैं।  श्री सिंह साहिब से मेरा परिचय वाट्स एप पर एक समूह के माध्यम से हुआ। बस एक संक्षिप्त सी मुलाकात डा रामअवतार शर्माजी के आयोजन में कांस्टीट्यूशन क्लब में हुई थी। इन्होंने मुझे अपने साथ कलुपुरा चलने का निमंत्रण दिया। इन्हीं के वाहन पर सवार होकर हम  मेट्रो स्टेशन के  नौएडा सैक्टर 18 से सैक्टर 92 पहुंचे । और कुछ अन्य लोगों के साथ कलुपुरा जाने की योजना के बारे में जानकारी मिली।  इसी सेक्टर में  श्री सिंह साहेब का आवास भी है । 

गाड़ी में  हमें यह जानकारी भी मिली कि सैक्टर 92 नौएडा रेजीडेन्ट वेलफेयर एसोसियेशन के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश श्री पी एन पाराशर जी हमारे साथ कलुपुरा और सूकर क्षेत्र की यात्रा पर चलेंगे। रात्रि विश्राम हम इन्ही के सैलई गांव में काम करेंगे। श्री सिंहजी ने एक अद्भुत जानकारी पाराशर जी के बारे में दी। उन्होंने बताया कि श्री पाराशर जी पिछले कुछ वर्षों से हर साल समाज के निर्धन वर्ग के डेढ़ से दो दर्जन कन्याओंं का विवाह करवा रहे हैं। इनका कन्यादान और नयी गृहस्थी की आवश्यक हर वस्तु पिता भाव से दान कर रहे हैं। यह जानकारी सिंह साहेब जब तक मुझे दे रहे थे तब तक श्री पाराशर जी का आवास आ गया और वे हमें जाने के लिए पूरी तरह तैयार मिले।

भारत वर्ष में अतिथि परंपरा क्या होती है ? अतिथि देवो भव क्यों कहा गया है ?  इसके साक्षात दर्शन मुझे जीवन में पहली बार पाराशर जी के आवास परिसर में बाहरी बरामदे पर हुए। हालांकि मैं स्वयं मिथिला का हूं और अतिथि परंपरा से परिचित हूं । लेकिन पहली मुलाकात में जिस सौजन्य और विनय के दर्शन हुए वह ब्रजमंडल में ही मिल सकता है और वह भी उस कुल में जहां ये संस्कार कलियुग में भी बचे हुए हों। 

श्री पाराशर जी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश हैं। आयु में मुझसे बड़े हैं। पद, ज्ञान और अनुभव मुझसे विशाल है । लेकिन अपने द्वार पर बालक नचिकेता को तीन दिन पाकर यमराज ने आतिथ्य परंपरा का जैसा दर्शन मिथक साहित्य में दिया गया है ,वैसी ही अनुभूति , मुझे पंडित पाराशर जी के द्वार पर हुई। हमें यथा शीघ्र चलना था ताकि हम समय से पहुंच सकें।

लेकिन श्री पाराशर जी ने कहा कि पाठक जी पहली बार आवास पर आए हैं ऐसे ही कैसे चले जाएंगे। 
विशाल कोठी में एक सहायक के अलावा और कोई नहीं था। सहायक गाड़ी में सामान रखने में व्यस्त था और वयोवृद्ध पंडित पाराशर जी अपने द्वार पर अकस्मात आए अतिथि की आवभगत में लगे थे। अपने हाथों से घर से ढूंढ कर मिठाई का पैकेट लेकर आए और कहा कि ग्रहण कीजिए आप यहां से ऐसे ही खाली मुँह नहीं जा सकते। ऐसा स्नेह और ये अपनापन मेरे लिए रामजी की लीला से कम नहीं है। 

हालांकि यह तो लीला के आरंभिक पल थे  ऐसा अब लगता है क्योंकि अनेक ऐसी घटनाएं हुईं अगले 30 घंटों के दौरान जो हम तीन व्यक्तियों आदरणीय श्री रामवीर सिंह जी, आदरणीय श्री प्रेम नारायण पाराशर जी और मेरे लिए जीवन निधि के रूप में सुरक्षित हो गए हैं।

मिठाई खिलाने के बाद अपने हाथों से जल पिलाना और फिर तौलिया अपने हाथों में लेकर मेरे गीले हाथों को स्नेह से पोंछने के लिए तत्पर रहना .............

इतना स्नेह, ये सम्मान अप्रत्याशित था मेरे लिए। मैं एक बेहद दंभी और रूखा व्यक्ति अपने आपको जानता हूं जो किसी की ना तो परवाह करता है और ना ही तवज्जो देता है, तब तक, जब तक उसकी योग्यता की परख अपनी कसौटी पर ना कर ले। कोई भी व्यक्ति किसी पद पर हो,  कितना भी धनवान हो , विद्वान हो , प्रख्यात हो मेरे लिए उसकी महत्ता तब तक नहीं है जब तक वह अपने आपको मेरी कसौटी पर प्रमाणित नहीं कर ले।

लेकिन पंडित पाराशर जी कसौटी पर जांचे जाने से पहले ही अपने विनय और सौजन्य से मेरी कसौटी की सीमाओं से ऊपर उठ गए। 

रास्ते में कलुपुरा की ओर जाते हुए विविध प्रसंगो पर चर्चा होती रही । अचानक मेरी जीवन संगिनी का फोन आया कि तुम्हारे आंवले के दो पौधे लग गए। एक पौधा स्कूल में लगाया गया और एक मंदिर में लगाया गया। इससे पहले आंवले का एक पौधा मैं अपने हाथों से एक पार्क में लगा आया था। आंवले के कुछ बीज बारिश में विभिन्न स्थानों पर जमा चुका हूं इस उम्मीद के साथ कि इनसे पौधे निकलेंगे, पल्लवित पुष्पित होंगे। मेरी कामना है कि ऐसे जीवन उपयोगी फल - फूल -सब्जियां जो दूर से मंगायी जाती हैं उनका उत्पादन शहरों के सबसे निकटतम क्षेत्र में हो तो  हमारा कल्याण होगा । 

आंवले के ये तीन पौधे मामूली नहीं हैं। 

दरअसल 20-12-15 को AIG meeting में दिल्ली के रजौरी गार्डन मेट्रो स्टेशन के पास बिकानेर वाला परिसर में डाक्टर अनिल शर्मा ने सुबह में चाय पीने से भी पहले प्रथम आहार के रूप में  क्षारीय पदार्थ लेने से पाचन तंत्र बिल्कुल ठीक रहने की सलाह दी थी ।
और कुछ नहीं तो कम से कम एक आंवला या आंवले का मुरब्बा चबाकर खाने और पानी पीकर कुछ देर के बाद चाय पीने की सलाह दी थी । मीटिंग से लौटने के बाद हमने अपने घर में ताजा आंवले मंगाए । आंवले को धो सुखा कर काटा गया । इनके बीज सुखाकर अलग रखे गए। बीज निकले आंवले को पूरी तरह धूप में सुखाकर रखा गया । 

सूखे आंवले का इस्तेमाल प्रतिदिन एक आंवले के बराबर टुकड़ों को पानी में भिगोकर हम कर रहे हैं । कुछ बीज को अपने गमलों में बोया गया । लगभग बीस पौधे निकले । इन्हें अलग अलग गमलों में डाला गया । तीन पौधे बचे । इनमें से एक पौधा दिल्ली नगर निगम के एक प्राथमिक पाठशाला में 10 अगस्त को गोस्वामी तुलसी दास जी की जयंती पर लगाया गया। दूसरा पौधा इसी तिथि को एक मंदिर परिसर में और तीसरा कुछ दिन पहले द्वारका सैक्टर 6 , नयी दिल्ली के एक पार्क में लगाया गया। बाक़ी बचे आंवले के बीज उचित स्थानों पर पौधा निकलने के लिए लगा दिए गए ।

आंवला कल्प वृक्ष माना गया है । हम आंवले का इस्तेमाल तरह तरह से करते हैं । इन्हें दूर दराज के जंगलों और बगीचों से तोड़ कर लाया जाता है । यदि हम अपने आसपास के पार्कों , सड़क के दोनों ओर , सोसाइटी कैम्पस में लगाएँ तो आंवला हमें बाहर से मंगाना नहीं पड़ेंगा। इन आंवलों के नियमित उपयोग से हमारा पाचन तंत्र और यौवन दोनों सुरक्षित रहेगा । च्यवन ऋषि इसी आंवले के प्राश को खाकर फिर से जवान हुए थे । एक आंवला रोज प्रातःकाल हम खाएँ तो चिरयौवन पाएँगे । 

आंवला खाने के लिए अपने आवास के इर्द गिर्द इसका पौधा  हम खुद लगाएँ । यह मेरा लक्ष्य है। आंवला ही नहीं अन्य आवश्यक फल - फूल वनस्पतियां भी हमारे इर्द गिर्द हों और हम इनके महत्व को जानें तो अपने तन को स्वस्थ रख सकते हैं। मन को प्रसन्न रख सकते हैं। 

मैं अपने हाथों से उगाए आंवले के बीज को कल्पवृक्ष के रूप में मान रहा हूं।  अपनी जीवन संगिनी से मैंने आग्रह किया था कि देखो ये पौधे मेरे जन्म दिन के आसपास धरती पर आए हैं । इन्हें गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर हम अपने आंगन से उनके स्वगृह में लगाएंगे। तुम अपने हाथों से लगाओ। हम हर साल आंवले के कुछ पौधे,  इस तिथि को और अन्य महत्वपूर्ण दिवसों पर लगाएंगे।

 जीवनसंगिनी हर पुरुष की शक्ति होती हैं। हमें अपने शक्ति की पहचान करनी चाहिए और उन्हें अपने जीवन में वही स्थान देना चाहिए जिसकी वे हकदार हैं और जिनकी कृपा और सक्रिय सहयोग से हमारा जीवन आनन्दमय रहता है । 

ठीक यही स्थिति नारी तन में जन्म लेने वाली स्त्री की है । विवाहित स्त्रियों को अपने पति को नारायण के रूप में या फिर भोलेनाथ के रूप में अंगीकार करना चाहिए। जिस विवाहिता को इन दो पुरुष रूपों में, अपने पति का जो भी स्वरूप पसंद हो एक को चुन लेना चाहिए। दोनों के अपने सुख और दुख हैं। 
दांपत्य में इस तरह की भावना आपसी सुख दुख को समझने और देव ऋण, पितृ ऋण से ऊऋण होने में सहायक होती है।

दरअसल जीव जगत, प्रकृति और ब्रह्म के साथ मेरे प्रयोग बचपन से चल रहे हैं। पेड़ पौधों और वनस्पतियों के साथ मेरे प्रयोग लंबे समय से चल रहे हैं। मेरे इस प्रयोग के अनेकों साक्षी हैं। प्रमाणित करने के लिए साक्ष्य हैं । एक साक्ष्य तो ब्लाग के इसी तन पर मौजूद है जिसका लिंक दिया जा रहा है।

शनिवार, 2 अप्रैल 2016 वनस्पति और प्राणि जगत के संबंधों के बारे में वर्ष 2016 के दो रोचक उदाहरण
http://dreamdwarka.blogspot.in/2016/04/2016_2.html


मुझसे आंवले के बारे में जानकारी मिलने के बाद श्री पाराशर जी ने तुरंत अपनी जीवन संगिनी को फोन 

लगाया और कहा कि आंवले के जितने पौधे मिले, खरीद लो। उन्हें भी लगाना है। 

अब ये रामजी की लीला का अगला चरण है। 

श्रीमती पाराशर का फोन कुछ देर बाद आया कि देखो इस नर्सरी में जहां मैं पौधे खरीद रही हूं आंवले नहीं मिल 

रहे आप उस नर्सरी से आंवले के पौधे खरीद कर लेते आना जो रास्ते में पड़ेगा। ऐसा ही किया गया। 


उसी दिन रात में श्रीमती पाराशर जी के दर्शन हुए और जानकारी मिली कि उन्होंने लगभग तीन हजार पौधे 

आज अपने बगीचे में अपने सामने लगवाए हैं।  पौधों को लगवाने के बाद श्रीमती पाराशर ने सैलई धाम के 

हनुमान जी से कहा  कि पौधे तो मैंने लगा दिए लेकिन अब इन्हें पानी देने और जिंदा बचाने की जिम्मेदारी 

हनुमानजी की है। 


बेशक सावन का महीना है लेकिन नियमित बारिश हो और पौधे लगाने के बाद आसमानी बारिश डिमांड पर हो 

ऐसा देखने में कम आता है। 

लेकिन सैलई धाम में ऐसा होता है और वाकई श्रीमती पाराशर द्वारा पौधा रोपण के बाद शाम में जो बारिश 

शुरु हुई वह सारी रात होती रही और अगले दिन भी रह रह कर बारिश होती रही। 

आंवले के दो पौधे श्री पाराशर जी ने हम दो अतिथियों के हाथों से सैलई धाम में रोपण के लिए खरीदे और ये 

दोनों पौधे अगले दिन प्रातःकाल लगाए गए। 

एक श्री रामवीर सिंह जी ने लगाया और दूसरा मैंने ।

सैलई धाम सिद्ध पीठ है। इस पीठ के बारे में चर्चा फिर कभी।

अभी तो सावन शुक्ल द्वादशी तिथि को 15 अगस्त 2016 को अपना संकल्प दोहराता हूं कि जीवनोपयोगी 

फल फूल सब्जी और अन्य वनस्पतियों को महानगरों की सीमा के अंदर लगाने के लिए जन जन को जगाने 

का अभियान जारी रहेगा।।

आज सोमवार का दिन है । भोलेनाथ की पूजा का विशेष दिवस है मां पार्वती की उपासना  का दिन है। जो भी 

इन पंक्तियों को श्रद्धा और विश्वास के साथ जिस किसी दिन पढ़ें उनका अनुराग अपने जीवन साथी में प्रगाढ़ 

हो,  दोनों युगल एक दूसरे के सहयोग से परस्पर पल्लवित पुष्पित हों।

वनस्पतियों के देव चंद्रमा की उन पर कृपा हो और उनके हाथों से लगाए पौधे अमर होकर मानवता की रक्षा करें।         

रविवार, 14 अगस्त 2016

सावन शुक्ल एकादशी संकल्पः 2- गोस्वामी तुलसी दासजी की जयंती पर कलुपुरा और सूकर क्षेत्र की अविस्मरणीय यात्राः AIG वाट्स एप लोक सेवा का विस्तार ड्रीम द्वारका ब्लॉग के साथ

रामजी की लीला अद्भुत है। इनकी लीला को समझना और संकेतों को पकड़ना बेहद कठिन है। 

कलुपुरा झाझर क्षेत्र में अध्यापक पद पर कार्यरत  रामभक्त श्री  संजय शर्मा जी ने  वाट्सएप के सुंदर कांड परिचर्चा समूह में दुख व्यक्त किया कि हमने सुंदरकांड पाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया और इस समूह से किसी व्यक्ति ने कोई दिलचस्पी नहीं ली।

यह समूह पहले मानस अवलोकन संस्था के नाम से चल रहा था लेकिन सावन अमावस्या की तिथि को इसका नाम बदल कर सुंदरकांड परिचर्चा समूह कर दिया गया। क्यों ऐसा किया गया यह मैं नहीं जानता लेकिन क्षिति जल पावक गगन समीरा श्रृंख्ला के तहत मैं प्रातःकाल प्रतिदिन लगभग पंद्रह मिनट तक तन और मन को स्वस्थ रखने के उपायों पर अपने विचार AIG whatsapp group  में 15 मई 2016 जानकी जयंती के अवसर से लगातार रखता आ रहा  हूं। ये विचार 3-5 ऑडियो क्लिप्स के रूप में रखे जाते हैं।

अपनी चर्चा में जल तत्व पर बात करते हुए मैंने कहा था कि  चंद्रमा की गति के साथ हमारे तन - मन के अंदर जल तत्व का प्रसार और संकोच होता है। जैसे पूर्णिमा की तिथि के आसपास सागर में ज्वार -भाटा का भौतिक प्रभाव देखने को मिलता है ठीक वैसे ही हमारे मन पर भी इसका असर पड़ता है। 

सुनने पर ये तथ्य बड़े आश्चर्य की बात लग सकते हैं । मगर कोई  चाहे तो इन पंक्तियों को कभी भी पढ़ रहे हों  इन पंच तत्वों पर प्रयोग कर सकते हैं।

 सावन अमावस्या 2016 की तिथि से दो तीन पहले वाट्स एप के एक दो ग्रुप नहीं बल्कि कई समूहों में आपसी नोकझोंक और विवाद अनुशासन की व्यवस्था लगभग एक ही तरीके से कही सुनी लिखी अभिव्यक्त की जा रही थीं।  और निज अमावस्या की तिथि को मानस अवलोकन संस्था वाट्सएप समूह सुन्दरकांड परिचर्चा समूह में बदल गया। AIG में नाम के स्तर पर तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन इसके माडरेटर और कई सदस्यों का व्यवहार परिवर्तित हो गया। 

चूंकि ये मेरे प्रयोग के विषय हैं इसलिए ना केवल मैं इन पर नजर रखता हूं बल्कि इनके परिणामों को अपने ऑडियो मैसेज में रखता भी हूं । मेरा लक्ष्य स्पष्ट है। मुस्कान मेल के रूप में यह सेवा लोकसेवा है और जिस किसी को इसकी आवश्यकता है वह इसका लाभ   अपने तन मन की बनावट को जानकर उठा सकता है। अपनी समस्याओं का निदान मुस्कुराते हुए पा सकता है।

 श्री संजय जी की ओऱ से  पहले आयोजन को लेकर दुख व्यक्त किया गया और उसके बाद अपने गांव कलुपुरा में सावन शुक्ल सप्तमी तिथि तदनुसार 10 अगस्त 2016 को  गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर एक दूसरे आयोजन की जानकारी  नवनामित समूह में दी।

यह सूचना देखकर मेरे मन में कलुपुरा जाने की इच्छा हुई। क्यों हुई यह मैं नहीं जानता।


लेकिन यह मेरी आदत है जहां कहीं मेरी दृष्टि में लोक कल्याण का बड़ा काम हो रहा हो। जिसके आयोजन से जुड़े लोग शुभ संकल्प वाले दिखें तो वहां हानि लाभ की परवाह किए पहुंचना अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना और यथाशक्ति सहयोग देना बचपन से मेरी आदत है। अन्ना हजारे के दिल्ली आंदोलन के पहले दिन जंतर मंतर पर उनकी सभा में उपस्थित  अंगुली पर गिने जा सकने वाले मुट्ठी भर लोगों में एक मैं भी था। जो लंबी अवधि तक साथ रहकर इस आंदोलन से अलग हुआ था।

इसीलिए श्री संजय जी के आयोजन को समझने की जिज्ञासा हुई। मन में इच्छा हुई।

इच्छा होने के साथ रामजी की लीला शुरु हुई। अगले दिन इसी समूह के श्री रामवीर सिंह जी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं इस आयोजन में चलूंगा। मैं तुरंत तो स्वस्ति नहीं दे सका क्योंकि रोजगार के रूप में कबीर का वंशज होने के नाते रोज कुआं खोदना और पानी पीने की स्वतंत्र आजीविका अपना रखी है। ऐसे में दिल्ली से बाहर के किसी भी आयोजन में जाने से पहले उचित व्यवस्था करना मेरी आवश्यकताओं में शामिल है।

लेकिन सात अगस्त रविवार को जब अगले सोमवार से रविवार यानि आज सावन शुक्ल पक्ष एकादशी तक की व्यस्तताओं का क्रम निर्धारित हो गया तो मैंने कलुपुरा चलने की हां कर दी।

अब मेरे हामी भरने के साथ रामजी की लीला का अगला चरण शुरु हुआ। 

योजना के अनुसार दस अगस्त बुधवार को मुझे नौएडा सेक्टर 18 पहुंचना था और वहां से आगे कलुपुरा मुझे श्री रामवीर सिंह जी ले चलते।  चलने से ठीक एक दिन पहले मुझे श्री रामवीर सिंह जी का संदेश मिला कि क्या मैं कलुपुरा आयोजन के बाद एक और आयोजन में चल सकता हूं। यह आयोजन गोस्वामीजी की जन्मभूमि सोरोंजी के निकट सूकर क्षेत्र में होगा ।

मैंने बस इतना निवेदन किया कि देखिए बुधवार का दिन मैंने इस आयोजन के नाम दिया है यदि एक साथ हम  दो आयोजन में भाग ले सकें तो कोई आपत्ति नहीं है बस  हमें  अगले दिन प्रातःकाल दस बजे तक वापस लौट आना होगा क्योंकि गुरुवार अपराह्न का समय मैं ने किसी और काम के लिए निर्धारित कर रखा है। उन्होंने कहा ऐसा ही होगा बस हम रात्रि विश्राम कर लेंगे और प्रातःकाल लौट चलेंगे।

दस अगस्त 2016 को मैं द्वारका सैक्टर दस नई दिल्ली से पहली मैट्रो के साथ नौएडा पहुंचा । वहां जाकर मुझे जानकारी मिली कि दो और व्यक्ति हमारे साथ चलेंगे । इन दो व्यक्तियों में से एक ने कहा कि वे कुछ विलंब से अन्य वाहन से चलेंगे और एक अन्य महापुरुष हमारे साथ चलने के लिए तैयार मिले।

यहां यह जानकारी देना मैं आवश्यक समझता हू्ं कि गोस्वामीजी की जयंती पर सावनशुक्ल सप्तमी तिथि 10 अगस्त 2016 को जो कुछ घटित हुआ इनमें से कोई भी घटना पूर्व निर्धारित नहीं थी। बस संयोग एक दूसरे से मिलते चले जा रहे थे और रामजी की लीला घटित हो रही थी।

सावन शुक्ल एकादशी तिथि को अब मैं  दूसरा संकल्प ले रहा हूं ।  आने वाले दिनों में मैं वाट्सएप पर अपनी वायस मैसेज सेवा को इस ब्लाग के साथ जोड़ूंगा ।  जो भी ज्ञान तन - मन की आराधना कर मुझे अर्जित हुआ है वह बिना किसी शुल्क लिए आजीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित करूंगा। 

जो भी व्यक्ति मेरे विचारों को सुन कर मार्गदर्शन के लिए आए उसकी सहायता मां जानकी की शक्ति से संपन्न हो। रामजी कृपा करें और पवन पुत्र मार्गदर्शन करें।

-----1045 रात्रि
यह चर्चा जारी रहेगी।

इसके कलुपुरा प्रसंग, आंवला प्रसंग और सैलई धाम प्रसंग अलग अलग पोस्ट के रूप में लिखे जाएंगे।    

सावन शुक्ल एकादशी संकल्पः 1- गोस्वामी तुलसी दासजी की जयंती पर कलुपुरा और सूकर क्षेत्र की अविस्मरणीय यात्राः AIG वाट्स एप लोक सेवा का विस्तार ड्रीम द्वारका ब्लॉग के साथ

रामजी की लीला अद्भुत है। इसे समझना और इसकी व्याख्या कर पाना भी बेहद कठिन है। हम रामजी की लीला के आज के विचार बिन्दुओं तक पहुंचें उससे पहले आज की तिथि और प्रसंग को समझ लें।

आज वर्ष दो हजार सोलह की सावन शुक्ल एकादशी तिथि है। तदनुसार रविवार 14-08-2016। संध्या काल साढ़े सात बजे कुछ विचार यहां लिखने शुरु हुए जो लगभग नौ बजे संपनन्न हुए  हैं। इस वर्ष जानकी जयंती से पहले  Dr Gyan Singh Gaudpal द्वारा गठित An Iniative Group AIG टीम के लिए प्रतिदिन अपने विचार प्रातःकाल ऑडियो क्लिप्स के रूप में रखने का अनुरोध हुआ था।  जानकी जयंती 15 अप्रैल 2016 से यह सेवा शुरु हो गयी और मेरी सुविधानुसार नियमित रूप से चल रही है। विविध विषयों पर प्रातःकाल विचार रखे जा रहे हैं । इन पर टीका टिप्पणी भी होती है और जब कभी मुझसे लोग आमने सामने मिलते हैं तो यह बताते हैं कि वे इसे नियमित सुन रहे हैं। इस पर एक स्वतंत्र आलेख लिखा जा चुका है। जिसका लिंक संलग्न है

 http://dreamdwarka.blogspot.in/2016/06/15-2016.html 

आज कलुपुरा उत्तर प्रदेश में कार्यरत  मानस अवलोकन संस्था के श्री संजय शर्माजी द्वारा शुरु वाट्सएप समूह  सुन्दर कांड परिचर्चा समूह में सुंदर कांड की कुछ पंक्तियों की व्याख्या 3 ऑडियो क्लिप्स के माध्यम से करते हुए समर्थ साधक और रामकथा के व्याख्याता डॉ रामगोपाल तिवारी मानस रत्न ने कहा कि इस प्रसंग में श्री हनुमानजी दुविधा में हैं कि लंका जलाऊं या नहीं जलाऊं । उचित होगा इन दो विक्लपों को काल पर छोड़ दूं और जैसी भी परिस्थिति बने उस अनुसार काम करूं। कर्ता भाव से ऊपर उठकर जैसा भी उचित हो उस अनुकूल कर्म करूं।

श्री तिवारी जी को जितना सुन पाया हूं और समझ पाया हूं उसमें उनकी दृष्टि साफ लग रही है। रामकथा के व्याख्याता और गवैया अनेक हैं पर रामकथा के मर्म और माया बंधन से मुक्त वाचक बहुत कम हैं। ये संभवतः काल की कसौटी पर उन मुक्त में से एक साबित हों । समय साबित करेगा।

यहां श्री तिवारी जी का यह कथन बेहद मह्त्वपूर्ण है दुविधा में नहीं रहकर काल के प्रवाह पर अपनी जीवन नैया को छोड़ देना और उचित अवसर पर उचित कर्म करना। 

  हम में से कितने लोग हैं जो इस तथ्य को समझ पाते हैं और टिक कर अपने कर्म कर पाते हैं ? यह सवाल हम में से हर उस व्यक्ति को पूछना चाहिए जो अपने आप को समझना चाहते हैं । अपने जीवन लक्ष्य को पाना चाहते हैं।

वाट्सएप पर नियमित ऑडियो क्लिप्स के माध्यम से मेरे विचारों को रखा जाना इसी सवाल की खोज यात्रा है।
वर्ष 1982 में एशियाड के झिलमिलाते प्रसारण को पटना के श्रीकृष्ण विज्ञान केन्द्र में देखकर पहली बार मुझे टेलीविजन का भविष्य दिखा था और युवावस्था मैंने इस माध्यम से जुड़ने का फैसला किया था। उस समय यह तय नहीं था कि टेलीविजन का प्रसार इस रूप में होगा। लेकिन जैसा मैंने अपनी युवावस्था  में इसका भविष्य देखा था लगभग वैसा ही आज इसे पा रहा हूं।

इंटरनेट के विविध रूप और वाट्सएप जैसे औजार इसके अगले आयाम हैं जो दिनदिन और मजबूत होंगे ।  इनका विकास टेलीविजन की शक्ति को और बढ़ाएगा। जिस रूप में प्रयोग चल रहे हैं और सफलता मिल रही है उसमें कुछ वर्षों के बाद ऐसे स्मार्ट सेट उपलब्ध हो जाएंगे जिन में रूप और ध्वनि के साथ गंध का भी संगम होगा और लोग फूल को देख कर या किसी खाने के प्रचार को देखकर उसका गंध भी समझ पाएंगे।

 जिस दिन ऐसा होगा उस दिन मानव की तीन इंद्रियों, आंख , कान और नाक पर मशीनों का क़ब्ज़ा होगा । बाजार का अधिकार होगा और अज्ञानी मानव इसके शिकार बनेंगे। अभी सिर्फ दो इंद्रियों आंख और कान पर मशीनों के अधिकार ने मानव को अनेक बीमारियों का शिकार बनाया है। काउच पोटेटो जीवनशैली इसी की देन है और तीनों इन्द्रियों पर कब्ज़े का बाद भयावह परिणाम की बस कल्पना की जा सकती है।

इन अज्ञानियों की रक्षा के लिए , मशीनों के प्रहार और बाजार के हमले से बचाने के लिए प्रयास अभी से शुरु हो जाने चाहिए।

वाट्सएप पर मेरी ओर से जानकी जयंती के अवसर पर ऑडियो मैसेज लोकसेवा की शुरुआत इसीका एक अंग है यह इस पल मुझे लग रहा है।

श्रीराम मेरे आदर्श पुरुष हैं और जानकी आदर्श स्त्री। श्री रामायण जी की गाथा हमारा अतीत है यही हमें भविष्य की समस्याओं से निकालने की क्षमता भी रखता है।

रामजी हुए या नहीं इस पर हम मानव अंतहीन बहस कर सकते हैं लेकिन वाल्मीकि के रूप में एक लेखक हुए इसे कोई खारिज नहीं कर सकता। कालिदास और गोस्वामी तुलसीदास तनधारी मानस के रूप में अवतरित हुए और अपने समय में जनमानस को रामजी से जोड़ा इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता।

समकालीन समय में रामजी की कथा कहने वाले कथाकार रामजी की कथा तो कह रह रहे हैं लेकिन सगुण साकार राम के उपासक गोस्वामी तुलसी दास या निर्गुण निराकार राम के उपासक कबीर की तरह अपने तन मन को  स्वस्थ रखने की कला नहीं जानते । 

भारतीय इतिहास के  मध्यकाल के ये दोनों परस्पर एक दूसरे के विरोधी मार्गों के रामभक्तों ने आम लोगों के तन को अपने संगत में स्वस्थ रखना सिखाया ।  मन को प्रसन्न रखने का रास्ता बताया ।  खुद अपने तन को 120 से अधिक वर्षों तक जीवित और स्वस्थ रखकर प्रमाण के साथ साबित किया। आम जनमानस पर प्रभाव ऐसे ही नहीं पड़ता स्थायी छाप ऐसे ही नहीं गहरे उतर कर बैठ जाती है।

हमें समकाल में मनुष्य को स्वस्थ बनाना होगा। रामजी की गाथा और रामजी के जीवन मूल्य इसमें सहायक हो सकते हैं। इनसे सहायता लेकर  मशीनों के हमले और बाजार के प्रभाव से मानव को बचाया जा सकता है।  रामभक्तों को जगा कर यह लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। उनके तन और मन की समस्याओं को दूर करने का रास्ता बताना होगा और रामजी का दिया हुआ ये तन इसका उदाहरण बने यह सावन शुक्ल एकादशी का पहला संकल्प है।

रामजी ही अंगुली पकड़ कर बचपन से चला रहे हैं। उन्हीं के संस्कार से यह तन - मन पल्लवित पुष्पित हुआ है और उन्हीं की कृपा से आनन्दमय तन - मन की अवस्था में प्रतिपल ऊर्जस्वित हो रहा हूँ।

रामजी कृपा करें। मां जानकी सहायक हों। हनुमान जी मार्ग दिखाएं।

यह चर्चा  संकल्प 2 में जारी है।